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शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

सूरज डूबा दरिया में.......श्वेता सिन्हा

सूरज डूबा दरिया में हो गयी स्याह साँवलाई शाम।
मौन का घूँघट ओढ़े बैठी, दुल्हन-सी शरमाई शाम।।


थके पाँव पंछी भी लौटे,दीप सपन के आँख जले
बिटिया पूछे बाबा को,क्या झोली में भर लाई शाम।


छोड़ पुराने नये ख़्वाब  नयना भरने को आतुर  हैं,
पौंछ के काजल चाँदनी डाले थोड़ी-सी पगलाई शाम।


चुप है चंदा,चुप हैं तारे, वन के सारे पेड़ भी चुप हैं,
अंधेरे की ओढ़ चदरिया, लगता है पथराई शाम।


भर आँचल में जुगनू तारे बाँट दूँ मैं अंधेरों को 
भरूँ उजाला कण कण में,सोच-सोच मुस्काई शाम।


             #श्वेता🍁

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

नाजुक सी मोहब्बत है.... मनोज सिंह”मन”

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नाजुक सी मोहब्बत है, दुश्मन ज़माना है,
ये जन्मों का रिश्ता है, पर सबसे छुपाना है,

क्या तेरी मज़बूरी है, क्यों तुम्हें जाना है,
ये शीशे सा दिल है, पल में बिखर जाना है,

यंहा दीवानों का बस, मैखाना में ठिकाना है,
खुमार मोहब्बत का, सबका उतर जाना है,

अभी सबके ओठों पे, एक हसीं तराना है,
फिर गीत जुदाई के, यंहा सबको गाना है,

बेजां हुआ है दिल, कातिल वो पहचाना है,
बिंदास शमा से, परवाने को जल जाना है,

क्यों दस्तूर मोहब्बत का, ये बहुत पुराना है,
आँखों के पानी को, अश्कों में बदल जाना है,

- मनोज सिंह”मन”


गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

पल दो पल में......श्वेता सिन्हा


पल दो पल में ही ज़िदगी बदल जाती है।
खुशी हथेली पे रखी बर्फ़ सी पिघल जाती है।।

उम्र वक़्त की किताब थामे प्रश्न पूछती है,
ज़ख्म चुनते ये उम्र कैसे निकल जाती है।

दबी कोई चिंगारी होगी राख़ हुई याद में,
तन्हाई के शरारे में बेचैनियाँ मचल जाती है।

सुबह जिन्हें साथ लिये उगती है पहलू में,
उनकी राह तकते हर शाम ढल जाती है।

ख़्वाहिश लबों पर खिलती है हँसी बनकर,
आँसू बन उम्मीद पलकों से फिसल जाती है।

    श्वेता🍁

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

मुझसे ऐसी उम्मीदे रखते है....जॉन एलिया

मत पूछो कितना गमगीं हूँ गंगा जी और जमुना जी
ज्यादा मैं तुमको याद नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अपने किनारों से कह दीजो आंसू तुमको रोते है
अब मैं अपना सोग-नशीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

मैं जो बगुला बन कर बिखरा वक्त की पागल आंधी में
ज्यादा मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अब तो यहाँ के मौसम मुझसे ऐसी उम्मीदे रखते है
जैसे हमेशा से मै यही हूँ गंगा जी और जमुना जी

अमरोहे में बान नदी के पास जो लड़का रहता था 
अब वो कहाँ है? मै तो वही हूँ गंगा जी और जमुना जी 
- जॉन एलिया

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

दिन आजकल धूप से......श्वेता सिन्हा


दिन आजकल धूप से परेशान मिलती है,
साँवली शाम ऊँघती बहुत हैरान मिलती है।

रात के दामन पर सलवटें कम ही पड़ती है ,
टोहती चाँदनी से अजनबी पहचान मिलती है।

स्याह आसमां पर सितारे नज़्म बुनते है जब,
चाँद की वादियों में तहरीरें बेजुब़ान मिलती है।

दिल भटकता है जब ख़्वाहिशों के जंगल  में,
फुनगी पर ख़ाली हसरतों की दुकान मिलती है।

अधजले चाँद के टुकड़े से लिपटे अनमने बादल,
भरी यादों की गलियाँ दर्द से वीरान मिलती है।


           #श्वेता🍁

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

व्यग्र आशायें....आनंद कुमार राय

आशायें मेरी आँखों में हैं
आज शिशु -सी उमड़ रही,
अभी-अभी पग दो ही चले 
और व्यग्र-व्यथित-सी घुमड़ रही।

अनजाना, अनजानी राह पे 
समझ भरा मेरा काम न था, 
ख़ैर, चलो मैं इस जीवन से 
जो हासिल कर पाया हूँ,  
है अभिमान जो कुछ करता मैं 
सब उस की आँखों में हैं 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।

अभी उठाया है पग मैंने 
चलने की शुरुआत की है,  
तम में घिरा हुआ था कल तक
दिन में नया प्रभात किया है।
सम मेरे गम की आंधी में 
कई जीवन है उजाड़ रही ,  
पर आशायें मेरी आँखों में 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।
-आनंद कुमार राय

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

इस नदी की धार से.....दुष्यंत कुमार



इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

-दुष्यंत कुमार

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...