सूरज डूबा दरिया में हो गयी स्याह साँवलाई शाम।
मौन का घूँघट ओढ़े बैठी, दुल्हन-सी शरमाई शाम।।
थके पाँव पंछी भी लौटे,दीप सपन के आँख जले
बिटिया पूछे बाबा को,क्या झोली में भर लाई शाम।
छोड़ पुराने नये ख़्वाब नयना भरने को आतुर हैं,
पौंछ के काजल चाँदनी डाले थोड़ी-सी पगलाई शाम।
चुप है चंदा,चुप हैं तारे, वन के सारे पेड़ भी चुप हैं,
अंधेरे की ओढ़ चदरिया, लगता है पथराई शाम।
भर आँचल में जुगनू तारे बाँट दूँ मैं अंधेरों को
भरूँ उजाला कण कण में,सोच-सोच मुस्काई शाम।





