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शनिवार, 9 जून 2018

हर क्षण बस मंगल गाती........सीमा 'सदा' सिंघल

 
घर की दहलीज़ ने
आना-जाना और निभाना देखा
बन्द किवाड़ों ने सिर्फ़
अपना वजूद जाना
ये भूलकर की उन्हें थामकर
रखने वाली दहलीज़ 
कोई साँकल नहीं जो हर बार
बजकर या कुंदे पे चढ़कर
अपने होने का अहसास कराती
वो तो बस मौन ही
अपना होने का फ़र्ज निभाती है !!
...
खुशियों में रौनक बन जाती 
त्योहारों पे दीप सजा
जगमग हो जाती 
बने रंगोली जब भी
ये फूली न समाती
रंग उत्सव के पूछो इससे
हर क्षण बस मंगल गाती !!!!
-सीमा 'सदा' सिंघल

सोमवार, 21 मई 2018

आज जन्मदिन कवि सम्राट सुमित्रानन्दन जी पन्त का

आज जन्मदिन
कवि सम्राट सुमित्रानन्दन जी पन्त का
शत - शत नमन उनको
20 मई सन् 1900 में जन्म लिया इन्होंने
अल्मोड़ा में....धन्य हो गई भूमि
20 मई 1900 - 29 दिसम्बर 1977

चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

सुमित्रानंदन पंत की इस  कविता में अपना बचपन ढूढ़ने वाले हम 
उन्‍हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं।
:: प्रस्तुति सौजन्य ::
आदरणीय दीदी अलकनंदा सिंह
ख़ुदा के वास्ते से

शनिवार, 19 मई 2018

ना पतन की राह निकालो...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

विश्वास घात सा कर रहे 
मानव तुम अपने ही साथ 
जनम से लेकर मरण तक 
मैं हरदम देता तेरा साथ ! 

मात नहीं पर मात सरीखा 
नेह सदा करता 
पितृ हस्त की तरह सदा 
सर पर छाया  रखता ! 

भाई  बहन के निश्छल बंधन सा 
अपना अटूट है नाता 
और दोस्त सी वफा बराबर 
पूरे जीवन करता ! 

इतना ही नहीं फल फूल सदा 
तेरे लिये उगाता 
तू खाता हर्षित मेरा मन 
द्विग्णित  भाव उपजता ! 

श्वास श्वास मुझसे स्पंदित 
स्वच्छ वायु मुझसे पाता 
मुझे काट क्या सुख पायेगा  
अपना तो आदि काल से नाता ! 

मत बैठो उस ढहती कगार पर 
ना पतन की राह निकालो 
मेरा क्या मैं काष्ठ निर्जीव 
तुम अपना तो भला विचारों ! 

एक कटे और दस उगे 
फिर पांच से पचास 
पीढ़ी दर पीढ़ी यही सुमारग 
दिखलाओ इंसान ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता  ✍

गुरुवार, 10 मई 2018

वफ़ायें तो हुई है अब.......उपेन्द्र परवाज़

वफ़ायें तो हुई है अब जिस्मों का शबाब 
दुनिया के बगीचे में, प्यार हुआ काग़ज़ का गुलाब 

दिल जो टूटा करते थे गुज़रे ज़माने की बातें है 
इस ज़माने में रोज़ इक दिल तोड़ना, भी है ख़िताब।

अब बुझी अंगड़ाइयाँ हैं अब तब्बसुम ही नहीं
रोशनी बल्बों से मिलती, गुम हुए है आफ़ताब।

पाने की जब इतनी परवाह खोने से क्यों डर रहे
ये तो साहब ज़िन्दगी है, ना किसी बनिये का हिसाब। 

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
दुनिया कहती है की इनका फ़न है, कितना लाजवाब।

आदमी अब आदमी से रोज़ मिलाता है यहाँ
दिल अब शायद किसी से मिले, अब वो ज़माना है ज़नाब।
-उपेन्द्र परवाज़

बुधवार, 9 मई 2018

अब नहीं देखता ख़्वाब मैं रातों को.....नवल किशोर कुमार

अब नहीं देखता ख़्वाब मैं रातों को,
रातों में पलकें झपकाना भी भूल गया।

दिये हैं जालिम तुमने ज़ख़्म इतने कि,
ज़ख़्मों पर अब मरहम लगाना भूल गया।

वक़्तो गुज़र जाता है तन्हां इस कदर कि,
बीते वक़्तत का हिसाब लगाना भूल गया।

तेरी बेवफ़ाई के सहारे ज़िन्दा हूँ या नहीं,
ज़िन्दगी के अंतिम साँसें लेना भूल गया।

ग़म नहीं है मुझे कि तेरी बेवफ़ाई मिली,
तेरी बेवफ़ाई से प्यार का नाम भी भूल गया।

यूँ इस कदर जमींदोज़ होने का मलाल नहीं,
मैं तो अपनी क़ब्र पर फूल तक चढ़ना भूल गया।
-नवल किशोर कुमार

सोमवार, 7 मई 2018

इक ज़माना हो गया है.....कल्पना सक्सेना

तुमको रूठे  इक  ज़माना हो  गया है,
मुंह दिखाए इक  ज़माना  हो गया है।

हिज्र पल-पल  यूँ सताता हैं कि हमको,
मुस्कुराये   इक   ज़माना   हो  गया  है।

सोचते हैं  इन दिनों  हम भी  कहें  कुछ,
सबकी  सुनते इक  ज़माना  हो गया है।

और  कितनी  दूर  है  मंज़िल  न  जाने,
चलते - चलते इक  ज़माना  हो गया है।

उंगलियों   पर  तेरी  हमको  ऐ  ह़यात,
रक़्स  करते  इक  ज़माना  हो  गया है।

ऐ  दिले - वीरां  किसी  से   दोस्ती  कर,
तुझको  रोए  इक  ज़माना  हो  गया है।

मुंतज़िर  रुठी   हुईं  है  नींद  अज़ल  से,
ख़ाब  देखे  इक   ज़माना  हो  गया  है।
- कल्पना सक्सेना

शनिवार, 5 मई 2018

भोजपुरी रचना.....उर्मिला सिंह

भोजपुरी को सदा अनदेखा किया गया है। 
किसानोंकी व्यथा, वहां की नारियों की व्यथा 
पर रचनाएँ लिखी जातीं हैं 
परन्तु भोजपुरी में बहुत कम पढ़ने में आती है।
आपके समक्ष भोजपुरी में ये रचना प्रस्तुत कर रही हूँ 
प्रतिक्रिया की इच्छुक रहूंगी।

मैं तो चिरइया बाबुल तोरे आँगन की,
नान्हीं उमर खुरच खुरच दाना निकालू ,
भुखिया सतावे बापू ,होठवा पे संतोष मुस्काये,
अंगना में टुकुर - टुकुर देखे पाखी-
थाली क चउरा ,मनवा विकल होई जाये,
मिलि बैठी भुखिया मिटवली बापू ,
दाता से पूछी ला एक ही सवलिया
"गरीबन के जिनगी में काहे लिखला-
भूखिया - पियसिया, आँसूवन क धरिया !!

-उर्मिला सिंह

हर क्षण बस मंगल गाती........सीमा 'सदा' सिंघल

  घर की दहलीज़ ने आना-जाना और निभाना देखा बन्द किवाड़ों ने सिर्फ़ अपना वजूद जाना ये भूलकर की उन्हें थामकर रखने वाली दहलीज़  कोई साँकल ...