पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया
शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी कर रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
नेहा ने जाकर दरवाजा खोला। सामने पड़ोस में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला खड़ी थीं। चेहरे पर अपनापन था, लेकिन थोड़ी झिझक भी। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटी, नमस्ते… आज घर में मेहमान आ गए हैं। चाय बनाने लगी तो पता चला चीनी खत्म हो गई। अगर थोड़ा सा मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।”
नेहा ने पल भर सोचा। उसे अपनी मां की कही बात याद आ गई— “पड़ोसियों को एक बार देना शुरू करो, फिर बार-बार मांगने लगते हैं।” उसने हल्की आवाज में कहा, “आंटी, हमारे घर में भी थोड़ी ही बची है… माफ कीजिए।”
महिला मुस्कुराईं, “कोई बात नहीं बेटी,” और धीरे-धीरे वापस चली गईं।
इतने में आंगन में बैठी सास सावित्री देवी ने सब सुन लिया था। उन्होंने नेहा को पास बुलाया और प्यार से पूछा, “कौन था बहू?” नेहा बोली, “पड़ोस वाली आंटी थीं। चीनी मांग रही थीं… मैंने मना कर दिया।” सावित्री देवी कुछ पल चुप रहीं। फिर बोलीं, “बहू, मना करने से पहले एक बार दिल से सोच लेना चाहिए था।”
नेहा बोली, “मम्मीजी, मैं गलत नहीं हूं। मां हमेशा कहती थीं कि ज्यादा मदद करोगे तो लोग आदत बना लेते हैं।” सावित्री देवी ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी मां ने जो देखा होगा, वही सिखाया होगा। लेकिन मैंने जिंदगी में कुछ और देखा है।”
नेहा चुप हो गई।
सावित्री देवी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
“जब तुम्हारे पति छोटे थे, तब हमारे दिन बहुत मुश्किल थे। घर में कमाने वाला कोई नहीं था। एक दिन ऐसा आया कि घर में आटा तक नहीं बचा था। तुम्हारा पति रो रहा था… उसे भूख लगी थी। मैं बहुत देर तक बैठी रही, समझ नहीं आया क्या करूं। फिर हिम्मत करके पड़ोस में गई। हाथ कांप रहे थे… शर्म भी बहुत आ रही थी। दरवाजा खटखटाया और बोली— ‘दीदी, थोड़ा आटा मिल जाए तो बच्चों को रोटी बना दूं।’ जानती हो क्या हुआ?”
नेहा ने धीरे से पूछा, “क्या?” “उस घर की औरत मुझे अंदर ले गई। सिर्फ आटा ही नहीं दिया… साथ में सब्जी भी दी। और बोली— ‘बहन, पड़ोसी इसी दिन काम आते हैं। कभी तुम देना, कभी हम देंगे।’ उस दिन मेरे बच्चों ने पेट भरकर खाना खाया था। और मेरे दिल से एक डर निकल गया था।”
इतना कहते-कहते सावित्री देवी की आंखें भर आईं।
“बहू… मांगने वाला हमेशा मजबूरी में आता है। खुशी से कोई किसी का दरवाजा नहीं खटखटाता।” नेहा की नजरें झुक गईं।
उसे लगा जैसे उसने सच में गलती कर दी। वो तुरंत उठी। रसोई से एक कटोरी में चीनी भरी और पड़ोस के घर चली गई। दरवाजा खुला। वही आंटी सामने थीं।
नेहा बोली, “आंटी… माफ कर दीजिए। अभी चीनी मिल गई। ये रख लीजिए।”
महिला ने हैरानी से देखा। फिर मुस्कुरा दीं। “अरे बेटी, इतनी तकलीफ क्यों की?”
नेहा ने हाथ जोड़ लिए। “तकलीफ नहीं… गलती मेरी थी।” महिला ने चीनी ले ली। उनके चेहरे पर राहत साफ दिख रही थी।
अगले दिन सुबह दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
नेहा ने खोला तो सामने वही आंटी थीं। हाथ में स्टील की प्लेट थी। उसमें गरमा-गरम बेसन के लड्डू रखे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “कल तुमने चीनी दी थी न… उसी से बनाए हैं। सोचा सबसे पहले तुम्हारे घर ही दूं।” नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने उन्हें अंदर बुला लिया।
थोड़ी देर में बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि वो अकेली रहती थीं। उनके बेटे की नौकरी दूसरे शहर में थी। कुछ दिन पहले ही यहां किराए से रहने आई थीं।
धीरे-धीरे उनका घर और नेहा का घर एक परिवार जैसा बन गया।
कभी वो सब्जी भेज देती, कभी नेहा उनके लिए चाय बना देती। एक दिन नेहा की तबीयत अचानक खराब हो गई। तेज बुखार था। पति ऑफिस गए हुए थे। सावित्री देवी परेशान थीं।
तभी पड़ोस वाली आंटी को पता चला। वो तुरंत दवा लेकर आईं। माथे पर ठंडी पट्टी रखी। खिचड़ी बनाकर खिलाई। नेहा उन्हें देखती रही।
उसकी आंखें भर आईं।
धीरे से बोली, “आंटी… अगर उस दिन मैंने मम्मीजी की बात नहीं मानी होती, तो शायद आज ये अपनापन नहीं मिलता।” आंटी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। “बेटी… रिश्ते खून से ही नहीं बनते। कुछ रिश्ते एक कटोरी चीनी से भी बन जाते हैं।”
पास बैठी सावित्री देवी मुस्कुरा रही थीं। नेहा उनके पास आई और उनके हाथ पकड़ लिए।
“मम्मीजी… उस दिन आपने मुझे बहुत बड़ी बात सिखाई।” सावित्री देवी बोलीं—
“बहू, घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता। घर तब बनता है जब आसपास के लोगों के सुख-दुख भी अपने लगने लगें।”
उस दिन शाम को तीनों आंगन में बैठकर चाय पी रही थीं। हवा में अपनापन घुला था।
नेहा सोच रही थी… कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत शुरुआत किसी बड़े मौके से नहीं होती… बस एक छोटी सी मदद से होती है।
एक कटोरी चीनी से। और सच यही है— देने से कभी कुछ कम नहीं होता…
कई बार एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना
बड़ा रिश्ता बना देती है… जो उम्र भर साथ रहता है।
वंदना त्रिपाठी



