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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

 पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया


शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी कर रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

नेहा ने जाकर दरवाजा खोला। सामने पड़ोस में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला खड़ी थीं। चेहरे पर अपनापन था, लेकिन थोड़ी झिझक भी। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटी, नमस्ते… आज घर में मेहमान आ गए हैं। चाय बनाने लगी तो पता चला चीनी खत्म हो गई। अगर थोड़ा सा मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।”

नेहा ने पल भर सोचा। उसे अपनी मां की कही बात याद आ गई— “पड़ोसियों को एक बार देना शुरू करो, फिर बार-बार मांगने लगते हैं।” उसने हल्की आवाज में कहा, “आंटी, हमारे घर में भी थोड़ी ही बची है… माफ कीजिए।”

महिला मुस्कुराईं, “कोई बात नहीं बेटी,” और धीरे-धीरे वापस चली गईं।
इतने में आंगन में बैठी सास सावित्री देवी ने सब सुन लिया था। उन्होंने नेहा को पास बुलाया और प्यार से पूछा, “कौन था बहू?” नेहा बोली, “पड़ोस वाली आंटी थीं। चीनी मांग रही थीं… मैंने मना कर दिया।” सावित्री देवी कुछ पल चुप रहीं। फिर बोलीं, “बहू, मना करने से पहले एक बार दिल से सोच लेना चाहिए था।”

नेहा बोली, “मम्मीजी, मैं गलत नहीं हूं। मां हमेशा कहती थीं कि ज्यादा मदद करोगे तो लोग आदत बना लेते हैं।” सावित्री देवी ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी मां ने जो देखा होगा, वही सिखाया होगा। लेकिन मैंने जिंदगी में कुछ और देखा है।”
नेहा चुप हो गई।

सावित्री देवी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
“जब तुम्हारे पति छोटे थे, तब हमारे दिन बहुत मुश्किल थे। घर में कमाने वाला कोई नहीं था। एक दिन ऐसा आया कि घर में आटा तक नहीं बचा था। तुम्हारा पति रो रहा था… उसे भूख लगी थी। मैं बहुत देर तक बैठी रही, समझ नहीं आया क्या करूं। फिर हिम्मत करके पड़ोस में गई। हाथ कांप रहे थे… शर्म भी बहुत आ रही थी। दरवाजा खटखटाया और बोली— ‘दीदी, थोड़ा आटा मिल जाए तो बच्चों को रोटी बना दूं।’ जानती हो क्या हुआ?”

नेहा ने धीरे से पूछा, “क्या?” “उस घर की औरत मुझे अंदर ले गई। सिर्फ आटा ही नहीं दिया… साथ में सब्जी भी दी। और बोली— ‘बहन, पड़ोसी इसी दिन काम आते हैं। कभी तुम देना, कभी हम देंगे।’ उस दिन मेरे बच्चों ने पेट भरकर खाना खाया था। और मेरे दिल से एक डर निकल गया था।”

इतना कहते-कहते सावित्री देवी की आंखें भर आईं।
“बहू… मांगने वाला हमेशा मजबूरी में आता है। खुशी से कोई किसी का दरवाजा नहीं खटखटाता।” नेहा की नजरें झुक गईं।
उसे लगा जैसे उसने सच में गलती कर दी। वो तुरंत उठी। रसोई से एक कटोरी में चीनी भरी और पड़ोस के घर चली गई। दरवाजा खुला। वही आंटी सामने थीं।
नेहा बोली, “आंटी… माफ कर दीजिए। अभी चीनी मिल गई। ये रख लीजिए।”

महिला ने हैरानी से देखा। फिर मुस्कुरा दीं। “अरे बेटी, इतनी तकलीफ क्यों की?”
नेहा ने हाथ जोड़ लिए। “तकलीफ नहीं… गलती मेरी थी।” महिला ने चीनी ले ली। उनके चेहरे पर राहत साफ दिख रही थी।

अगले दिन सुबह दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
नेहा ने खोला तो सामने वही आंटी थीं। हाथ में स्टील की प्लेट थी। उसमें गरमा-गरम बेसन के लड्डू रखे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “कल तुमने चीनी दी थी न… उसी से बनाए हैं। सोचा सबसे पहले तुम्हारे घर ही दूं।” नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने उन्हें अंदर बुला लिया।

थोड़ी देर में बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि वो अकेली रहती थीं। उनके बेटे की नौकरी दूसरे शहर में थी। कुछ दिन पहले ही यहां किराए से रहने आई थीं।

धीरे-धीरे उनका घर और नेहा का घर एक परिवार जैसा बन गया।
कभी वो सब्जी भेज देती, कभी नेहा उनके लिए चाय बना देती। एक दिन नेहा की तबीयत अचानक खराब हो गई। तेज बुखार था। पति ऑफिस गए हुए थे। सावित्री देवी परेशान थीं।
तभी पड़ोस वाली आंटी को पता चला। वो तुरंत दवा लेकर आईं। माथे पर ठंडी पट्टी रखी। खिचड़ी बनाकर खिलाई। नेहा उन्हें देखती रही।
उसकी आंखें भर आईं।

धीरे से बोली, “आंटी… अगर उस दिन मैंने मम्मीजी की बात नहीं मानी होती, तो शायद आज ये अपनापन नहीं मिलता।” आंटी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। “बेटी… रिश्ते खून से ही नहीं बनते। कुछ रिश्ते एक कटोरी चीनी से भी बन जाते हैं।”

पास बैठी सावित्री देवी मुस्कुरा रही थीं। नेहा उनके पास आई और उनके हाथ पकड़ लिए।
“मम्मीजी… उस दिन आपने मुझे बहुत बड़ी बात सिखाई।” सावित्री देवी बोलीं—
“बहू, घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता। घर तब बनता है जब आसपास के लोगों के सुख-दुख भी अपने लगने लगें।”

उस दिन शाम को तीनों आंगन में बैठकर चाय पी रही थीं। हवा में अपनापन घुला था।
नेहा सोच रही थी… कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत शुरुआत किसी बड़े मौके से नहीं होती… बस एक छोटी सी मदद से होती है।
एक कटोरी चीनी से। और सच यही है— देने से कभी कुछ कम नहीं होता…

 कई बार एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना 
बड़ा रिश्ता बना देती है… जो उम्र भर साथ रहता है।


वंदना त्रिपाठी 

बुधवार, 26 अगस्त 2026

एक बकरा और एक घोड़ा

एक पठान के पास एक बकरा और एक घोडा था।
जिन्हें वो बहुत प्यार करता था।  



एक बार अचानक घोडा बीमार पड़ गया और बैठ गया। वो अब चल फिर नहीं सकता था।
पठान को इस बात की बड़ी चिंता हुयी। उसने घोड़े के इलाज के लिए डॉक्टर को बुलाया।

डॉक्टर ने जांच पड़ताल करने के बाद पठान को बताया कि....

“आपके घोड़े को बहुत खतरनाक बीमारी हुयी है। 
मैं इसे 4 दिन लगातार दवाई दूंगा। 
अगर ये चौथे दिन तक खड़ा हो गया तो बच जाएगा। 
यदि यह चौथे दिन तक खड़ा न हुआ तो मजबूरन इसे मारना पड़ेगा।”

यह सुन कर पठान को बहुत दुःख हुआ। 
लेकिन वह कर भी क्या सकता था।

डॉक्टर के जाने के बाद बकरे ने घोड़े को समझाने की कोशिश की।

“देखो, तुम कल एक बार जब डॉक्टर आये तो 
उठ जाना। वर्ना वो तुम्हें मार देंगे।”

लेकिन घोड़े पर इस बात का कोई असर न हुआ। 
वह दूसरे दिन न उठा। 
बकरे ने उसे दूसरे दिन भी समझाया। 
पर घोडा तो जैसे कान में रूई डाले बैठा था।

तीसरे दिन डॉक्टर फिर आया। 
उसने देखा कि घोड़ा फिर से खड़ा नहीं हुआ।

“बस एक दिन और अगर यह न खड़ा हुआ तो कल इसका आखिरी दिन होगा।”

इतना कह कर डॉक्टर चला गया।

तब बकरे ने एक आखिरी कोशिश करनी चाही।

“देखो, मैं तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा हूँ। 
जिन्दगी दोबारा नहीं मिलती। 
तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना। 
अपनी जान बचने के लिए बस एक बार 
उठ कर दौड़ना है।”

घोड़े ने बकरे की सलाह पर इस बार विचार किया। उसने सोच लिया अगर एक बार
हिम्मत करने से जान बच सकती है तो क्यों न कोशिश कर ली जाए।

अगले दिन डॉक्टर आया और जैसे ही घोड़े के पास गया तो घोड़ा अचानक से
उठा और दौड़ने लगा। 
डॉक्टर खुश हो गया और बोला,

“बधाई हो, आपका घोड़ा बच गया। 
अब इसे नहीं मरना पड़ेगा।”

यह खबर सुन पठान बहुत खुश हुआ 
और तुरंत बोला....

“डॉक्टर साहब आज खुश कर दिया आपने। 
मैं आज बहुत खुश हूँ और इसी ख़ुशी में 
आज बकरा कटेगा”!

शिक्षा :- आज के ज़माने में बस 
अपने काम से काम रखिये। 
नहीं तो किसी और को बचाने के चक्कर में 
आप भी बकरे की तरह कट जाओगे।



गुरुवार, 20 अगस्त 2026

बूंद भर खुशबू

 बूंद भर खुशबू

हर त्योहार दादी संदूक से एक छोटी -सी इत्र की शीशी निकालती। 
उंगली पर बस एक बूंद  लगाती और शीशी वापस रख देती। 
मैं हंस कर पूछता 'दादी , इतनी -सी?' वे मुस्कुरी भर देती।
उसके जाने के बाद अलमारी समेटते हुए 
वही शीशी हाथ लगी। 
नीचे एक पुरानी पर्ची दबी थी, पहली तनख्वाह से  इन्होंनें खरीदी थी।

उसी क्षण समझ में आया दादी इत्र नहीं बचा रही थी, 
उस दिन की खुशबू  बचा रही थी, 
जब उनके छोटे-से संसार ने पहली बार महकना शुरू किया था।

उस एक बूँद नें पूरी उम्र की खुशबू सम्हाले रक्खी थी

-जयवीर सिंह , लुधियाना

खुला दरवाजा अपनी निजता में दखल लगता था।

 दरवाजा -हरीश कुमार 'अमित'


खुला दरवाजा अपनी निजता में दखल लगता था। 
वे लोग मेरे घर पर नजर क्यों रख रहे हैं? मुझे यह पसंद नहीं। 
एक दिन कह ही दिया।



सामने वाले फ्लैट में पिछले दिनों जब से नए किराएदार आए थे।मैं परेशान-सा था। वजह यह थी कि उनके फ्लैट का लकड़ी वाला दरवाजा दिल भर खुला रहता था।सिर्फ जाली वाला दरवाजा वे बंद रखते थे। मुझे इससे कोफ़्त होती थी। क्योंकि मुझे लगता था लकड़ी वाला दरवाजा खुला रखकर वे मेरी जासूसी कर रहे हैं, मेरे घर पर कौन-कौन आया और मैंने क्या सामान मंगवाया, उनका खुला दरवाजा देखकर मैं मन ही मन कुढ़ता रहता था।

कई बार जी में आता कि कह दूं अपना दरवाजा बंद रखा करें, मगर फिर 
सोचकर रुक जाता कि वे लोग बुरा मान सकते हैं।या जवाब में यह भी कह सकते हैं 
यह उनकी मर्जी है वे दरवाजा या रखे या बंद।

आखिर एक दिन मैं उनके मुखिया को सुना दिया कि आप लोग लकड़ी वाला दरवाजा पूरे दिन खुला रखते हैं। मेरी बात सुनकर वह कहने लगा 'ऐसा तो हम आपके लिए ही करते हैं'। 

'मेरे लिए ?' मै हैरान थाहां आपके ही लिए तो। आप इस फ्लैट में अकेले रहते हैं।आपकी उम्र लगभग 80 बरस की है, हम अपना दरवाजा इसलिए खुला रखते हैं ताकि यह पता लगता रहे कि कोई गलत इंसान तो आपके यहां नहीं आया आपके कोई परेशानी या दिक्कत तो नहीं और जरूरत पड़ने पर हम आपकी मदद कर सकें
उनका जवाब सुनकर मैं अवाक रह गया कुछ बोल ही नहीं पाया

सही पड़ोसी पहचान ही नहीं पाया

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

मेरा सलीका मेरे साथ

मेरा सलीका

भाभी घर छोड़कर जा रही थी
उसने अलमारी में अपनी जगह खाली की 
चाबियां मेज पर रक्खी, मां के लिए दवा रखी,
दरवाजे के पास के बिखरे जूते करीने से रखे 
और जाते-जाते गंदे बर्तन भी धो दिए

दरवाजे खड़े भैया ने पूछा इतनी नाराजगी के बाद ये सब?

रिश्ता छोड़ रही हूं,अपना सलीका नहीं
यह कह कर मुस्कुराते हुए चली गई

-मेहनाज़ मंसूरी

रविवार, 8 सितंबर 2019

14...बेताल पच्चीसी....चोर क्यों रोया

चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?”

अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक साहूकार था, जिसके रत्नवती नाम की एक लड़की थी। वह सुन्दर थी। वह पुरुष के भेस में रहा करती थी और किसी से भी ब्याह नहीं करना चाहती थी। उसका पिता बड़ा दु:खी था।

इसी बीच नगर में खूब चोरियाँ होने लगी। प्रजा दु:खी हो गयी। कोशिश करने पर भी जब चोर पकड़ में न आया तो राजा स्वयं उसे पकड़ने के लिए निकला। एक दिन रात को जब राजा भेष बदलकर घूम रहा था तो उसे परकोटे के पास एक आदमी दिखाई दिया। राजा चुपचाप उसके पीछे चल दिया। चोर ने कहा, “तब तो तुम मेरे साथी हो। आओ, मेरे घर चलो।”

दोनो घर पहुँचे। उसे बिठलाकर चोर किसी काम के लिए चला गया। इसी बीच उसकी दासी आयी और बोली, “तुम यहाँ क्यों आये हो? चोर तुम्हें मार डालेगा। भाग जाओ।”

राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने फौज लेकर चोर का घर घेर लिया। जब चोर ने ये देखा तो वह लड़ने के लिए तैयार हो गया। दोनों में खूब लड़ाई हुई। अन्त में चोर हार गया। राजा उसे पकड़कर राजधानी में लाया और से सूली पर लटकाने का हुक्म दे दिया।

संयोग से रत्नवती ने उसे देखा तो वह उस पर मोहित हो गयी। पिता से बोली, “मैं इसके साथ ब्याह करूँगी, नहीं तो मर जाऊँगी।

पर राजा ने उसकी बात न मानी और चोर सूली पर लटका दिया। सूली पर लटकने से पहले चोर पहले तो बहुत रोया, फिर खूब हँसा। रत्नवती वहाँ पहुँच गयी और चोर के सिर को लेकर सती होने को चिता में बैठ गयी। उसी समय देवी ने आकाशवाणी की, “मैं तेरी पतिभक्ति से प्रसन्न हूँ। जो चाहे सो माँग।”

रत्नवती ने कहा, “मेरे पिता के कोई पुत्र नहीं है। सो वर दीजिए, कि उनसे सौ पुत्र हों।”

देवी प्रकट होकर बोलीं, “यही होगा। और कुछ माँगो।”

वह बोली, “मेरे पति जीवित हो जायें।”

देवी ने उसे जीवित कर दिया। दोनों का विवाह हो गया। राजा को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने चोर को अपना सेनापति बना लिया।

इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने पूछा, ‘हे राजन्, यह बताओ कि सूली पर लटकने से पहले चोर क्यों तो ज़ोर-ज़ोर से रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?”

राजा ने कहा, “रोया तो इसलिए कि वह राजा रत्नदत्त का कुछ भी भला न कर सकेगा। हँसा इसलिए कि रत्नवती बड़े-बड़े राजाओं और धनिकों को छोड़कर उस पर मुग्ध होकर मरने को तैयार हो गयी। स्त्री के मन की गति को कोई नहीं समझ सकता।”

इतना सुनकर बेताल गायब हो गया और पेड़ पर जा लटका। राजा फिर वहाँ गया और उसे लेकर चला तो रास्ते में उसने यह कथा कही।

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

13..साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन? बेताल पच्चीसी

साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन?

बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके हरिदास नाम का पुत्र था। हरिदास की बड़ी सुन्दर पत्नी थी। नाम था लावण्यवती। एक दिन वे महल के ऊपर छत पर सो रहे थे कि आधी रात के समय एक गंधर्व-कुमार आकाश में घूमता हुआ उधर से निकला। वह लावण्यवती के रूप पर मुग्ध होकर उसे उड़ाकर ले गया। जागने पर हरिदास ने देखा कि उसकी स्त्री नही है तो उसे बड़ा दुख हुआ और वह मरने के लिए तैयार हो गया। लोगों के समझाने पर वह मान तो गया; लेकिन यह सोचकर कि तीरथ करने से शायद पाप दूर हो जाय और स्त्री मिल जाय, वह घर से निकल पड़ा।

चलते-चलते वह किसी गाँव में एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। उसे भूखा देख ब्राह्मणी ने उसे कटोरा भरकर खीर दे दी और तालाब के किनारे बैठकर खाने को कहा। हरिदास खीर लेकर एक पेड़ के नीचे आया और कटोरा वहाँ रखकर तालाब मे हाथ-मुँह धोने गया। इसी बीच एक बाज किसी साँप को लेकर उसी पेड़ पर आ बैठा ओर जब वह उसे खाने लगा तो साँप के मुँह से ज़हर टपककर कटोरे में गिर गया। हरिदास को कुछ पता नहीं था। वह उस खीर को खा गया। ज़हर का असर होने पर वह तड़पने लगा और दौड़ा-दौड़ा ब्राह्मणी के पास आकर बोला, “तूने मुझे जहर दे दिया है।” इतना कहने के बाद हरिदास मर गया।

पति ने यह देखा तो ब्राह्मणी को ब्रह्मघातिनी कहकर घर से निकाल दिया।

इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्! बताओ कि साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन है?”

राजा ने कहा, “कोई नहीं। साँप तो इसलिए नहीं क्योंकि वह शत्रु के वश में था। बाज इसलिए नहीं कि वह भूखा था। जो उसे मिल गया, उसी को वह खाने लगा। ब्राह्मणी इसलिए नहीं कि उसने अपना धर्म समझकर उसे खीर दी थी और अच्छी दी थी। जो इन तीनों में से किसी को दोषी कहेगा, वह स्वयं दोषी होगा। इसलिए अपराधी ब्राह्मणी का पति था जिसने बिना विचारे ब्राह्मणी को घर से निकाल दिया।”

इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहाँ जाकर उसे लाना पड़ा। बेताल ने चलते-चलते नयी कहानी सुनायी।

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...