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शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

आँसुओं से लिखी ग़ज़ल...नीतू ठाकुर

आँसुओं से लिखी ग़ज़ल हमने, 
मेरे हमदम तेरी कहानी है,
अश्क़ टपके जो मेरी आँखों से, 
लोग सोचेंगे ये दीवानी है, 

वादा करना और मुकर जाना 
तेरी आदत बहुत पुरानी है 
फिर भी तुझ पर यकीन करता है 
ये तो दिल की मेरे नादानी है 

क्या करेंगे तुम्हारी दौलत का 
मिट रही हर घडी जवानी है 
मै जो कहती हूँ लौट आवो तुम 
मेरी तन्हाईयाँ बेमानी है 

लड़खड़ाते हुए कदम तेरे 
मेरी चाहत की ही नाकामी है 
मिट रही हर घडी मोहब्बत को 
अब तो यादों को ही बचानी है 

- नीतू ठाकुर 

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

खामोश जुबाँ .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


खामोश जुबाँ 
खामोश नजर 
खामोश 
बसर खामोश ! 

खामोशी के 
मंजर का 
हर पल है 
खामोश ! 

चाँद - चाँदनी 
मौन साधक से 
शबनम भी बहती 
खमोश ! 


नील गगन से 
निशब्द धरा तक 
हर जर्रा 
खामोश !
डॉ. इन्दिरा गुप्ता

बुधवार, 22 नवंबर 2017

खोटा सिक्का चलते देखा...कुसुम कोठारी

न करना गुमान कामयाबी का
चढता सूरज  ढलते देखा ।

बुझ गया हो दीप न डरना
प्रयासों से फिर जलते देखा ।

हीरा पड़ा रह जाता कई बार
और खोटा सिक्का चलते देखा ।

जिनके मां बाप हो संसार मे 
उनको  अनाथों सा पलते देखा ।

जिसका नही कोई दुनिया मे 
उनको  उचांई पर चढते देखा ।

कभी किसी की दाल न गलती
कभी पत्थर तक पिघलते देखा ।

समय पडे जब काम न किया तो
खाली हाथों को मलते देखा ।

कुछ सर पर छत लेकर ना खुश हैं 
कहीं जमीं पे सोने वालो को खुश देखा।
-कुसुम कोठारी।

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

ढोल के अंदर पोल.....पूनम श्रीवास्तव

आज के जमाने की 
कितनी बड़ी विडम्बना
है ये कि
एक कुत्ते को खरीदने 
में पांच हजार रुपये खर्च कर 
सकता है 
इंसान और
उसे खिलाने में लगभग पांच
हजार खर्च कर
सकता है और अपनी
गाड़ी में बैठा कर 
घूमाता भी है
जिससे की उसका
स्टेटस बढ़ता है
पर एक गरीब के बच्चे
को दो वक़्त की रोटी
खिलाने में 
या पेट भरने में उसका 
पैसा तथा स्टेटस दोनों ही
कम हो जाते हैं।
है ना 
कितनी अजीब बात 
और ऊपर से
ये भी कहना की हमें इन गरीब
बच्चों के लिए 
कुछ तो करना चाहिए 
ढोल के अंदर पोल ।

-पूनम श्रीवास्तव

सोमवार, 20 नवंबर 2017

जमाना भी था तब दिल्लगी का...डॉ. इन्दिरा


सुना -अनसुना 
कर
हर पल गुजरता 
क्या किस्सा 
कहे उनकी 
बेरुखी का ! 
उमर का
सफीना 
साहिल पे डूबा 
जमाना भी था 
तब दिल्लगी का ! 
साँसो की 
बेचैनियाँ
क्या कहे हम 
लगता था 
चक्कर जो 
उनकी गली का !
मेरी
इस खता को 
ना हँस कर
उड़ाओ 
किस्सा है 
ये मेरी
बेबसी का !
चाहा
बता कर 
दिल हल्का 
कर ले 
मखौल का
सबब
बना ये 
गमी का ! 
डॉ. इन्दिरा 

रविवार, 19 नवंबर 2017

तुम नहीं होती तो........डॉ. विनीता राहुरिकर

तुम नहीं होती तो
अलसाया रहता है
खिड़की का पर्दा
सोया रहता है देर तक
सूरज से नजरें चुराता...,

तुम नहीं होती हो तो
उदास रहता है 
चाय का कप
अपने साथी की याद में....

साथ वाली कुर्सी भी
अपने खालीपन में
बैचेनी से
पहलू बदलती रहती है.....

रात में तकिया
बहुत याद करता है
तुम्हारी बेतरतीब
उनींदी बिखरी लटों
और निश्चिंत साँसों की
उष्मीय आत्मीयता को....

तुम नहीं होती तो
क्या कहूँ
मेरा हाल भी कुछ
पर्दे, कप, कुर्सी
और रात में 
तकिये जैसा ही होता है....

-डॉ. विनीता राहुरिकर

शनिवार, 18 नवंबर 2017

बुलबुले.....श्वेता सिन्हा


जीवन के निरंतर
प्रवाह में
इच्छाएँ हमारी
पानी के बुलबुले से
कम तो नहीं,
पनपती है
टिक कर कुछ पल
दूसरे क्षण फूट जाती है
कभी तैरती है
बहाव के सहारे
कुछ देर सतह पर,
एकदम हल्की नाजुक
हर बार मिलकर जल में
फिर से उग आती है
अपने मुताबिक,
सूरज के
तेज़ किरणों को
सहकर कभी दिखाती है
इंद्रधनुष से अनगित रंग
ख्वाहिशों का बुलबुला
जीवन सरिता के
प्रवाह का द्योतक है,
अंत में सिंधु में
विलीन हो जाने तक
बनते , बिगड़ते ,तैरते
अंतहीन बुलबुले
समय की धारा में
करते है संघर्षमय सफर।

  श्वेता🍁

आँसुओं से लिखी ग़ज़ल...नीतू ठाकुर

आँसुओं से लिखी ग़ज़ल हमने,  मेरे हमदम तेरी कहानी है, अश्क़ टपके जो मेरी आँखों से,  लोग सोचेंगे ये दीवानी है,  वादा करना और मुकर ज...