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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

प्रश्न,,,,,सुनील घई


दूर क्षितिज में 
फटते बादलों में से उभरता- 
यह सुनहरा प्रकाश - ज्ञान किरण,
भरी प्रश्नों साथ।

किसी पुस्तक में न छपे उत्तर इसके,
न किये किसी ने 
प्रश्न मुझ से।

यह अन्दर से उभरे प्रश्न,
अन्तकरण में ही 
छिपे उत्तर इनके,
सिमित बुद्धि सहन कर पायेगी-
क्या उत्तरों की बरसात?

बैठा धरती पे देख रहा,
टकटकी लगाये,
क्या बसा है उस पार?

कुरेद कुरेद मन बुद्धि 
थक चूर हुए,
आत्म समर्पण कर बैठ गया,
मैं यहाँ और-
मैं ही वहाँ - उस पार।

यह उत्तर था या
एक और प्रश्न?
बस इसी सोच में डूब गया
मैं फिर एक बार।
-सुनील घई

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

प्रलय.......डॉ. जेन्नी शबनम


नहीं मालूम कौन ले गया 
रोटी को और सपनों को 
सिरहाने की नींद को 
और तन के ठौर को 
राह दिखाते ध्रुव तारे को 
और दिन के उजाले को 
मन की छाँव को 
और अपनों के गाँव को 
धधकती धरती और दहकता सूरज 
बौखलाई नदी और चीखता मौसम 
बाट जोह रहा है 
मेरे पिघलने का 
मेरे बिखरने का 
मैं ढहूँ तो एक बात हो 
मैं मिटूँ तो कोई बात हो!

-डॉ. जेन्नी शबनम

उल्फ़त या इबादत.....अशोक वशिष्ट

तुझको मालूम नहीं है कि मुहब्बत क्या है?
तुझको मालूम नहीं है कि इबादत क्या है?

जिसकी नस-नस में उसी का नाम रहता है,
उसका दिल जाने, ये रूह की उल्फ़त क्या है?

जिसको सूली का न डर है न किसी जहर का,
इक वो ही जाने कि, उसकी इनायत क्या है?

तुझको बस जिस्म की, जन्नत की भूख रहती है,
तुझको मालूम नहीं, प्यार की फ़ितरत क्या है?

खुदको खोकर जो उसका ही हो जाता है,
उसे पूछो कि ये, उल्फ़त या इबादत क्या है?
-अशोक वशिष्ट

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

उदासीनता ....शैलेन्द्र चौहान

क्या मुझे पसंद है
उदासीनता
क्या तटस्थता और
विरक्ति ही है
उपयुक्त जीवन शैली
क्या निष्क्रियता है
मेरा आदर्श ?
थमी हुई है हवा

निर्जन एकांत में
ध्वनि,
नहीं महत्वहीन
न नगण्य और
असंगत

-शैलेन्द्र चौहान

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े...कैफ़ी आज़मी

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े

जिस तरह हंस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-गम
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े
[नशेब=उतार ; फ़राज़=चढ़ाव ]

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

साकी सभी को है गम-ए-तश्नालबी मगर
मय है उसी के नाम पे जिस के उबाल पड़े

-कैफ़ी आज़मी

पायल छनकी....कुसुम कोठारी

उषा ने सुरमई शैया से
अपने सिंदूरी पांव उतारे
पायल छनकी
बिखरे सुनहरी किरणों के घुंघरू 
फैल गये अम्बर मे
उस क्षोर से क्षितिज तक
मचल उठे धरा से मिलने
दौड़ चले आतुर हो
खेलते पत्तियों से
कुछ पल द्रुम दलों पर ठहरे
श्वेत ओस को
इंद्रधनुषी बाना पहना चले
नदियों की कल कल मे
स्नान कर पानी मे रंग घोलते
लाजवन्ती को होले से
छूते प्यार से
अरविंद मे नव जीवन का
संदेश देते
कलियों फूलों मे
लुभावने रंग भरते
हल्की बरसती झरनों की
फुहारों पर इंद्रधनुष रचते 
छन्न से धरा का
आलिंगन करते,
जन जीवन को
नई हलचल देते
सारे विश्व पर अपनी
आभा छिटकाते
सुनहरी किरणों के घुंघरू।
-कुसुम कोठारी

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

“ज़माने में यही होता रहा है”.....अखिल भंडारी


किनारे पर खड़ा क्या सोचता है 
समुंदर दूर तक फैला हुआ है 

ज़मीं पैरों से निकली जा रही है 
सितारों की तरफ़ क्या देखता है 

चलो अब ढूँढ लें हम कारवाँ इक 
बड़ी मुश्किल से ये रस्ता मिला है 

हमें तो खींच लाई है मुहब्बत
तुम्हारा शहर तो देखा हुआ है 

नये कपड़े पहन के जा रहे हो 
वहाँ कीचड़ उछाला जा रहा है 

वहाँ तो बारिशें ही बारिशें हैं 
यहाँ कोई बदन जलता रहा है 

कभी उस को भी थी मुझ से मुहब्बत 
ये क़िस्सा अब पुराना हो चुका है 

बुरे दिन हैं सभी मुँह मोड़ लेंगे 
“ज़माने में यही होता रहा है”
-अखिल भंडारी

प्रश्न,,,,,सुनील घई

दूर क्षितिज में  फटते बादलों में से उभरता-  यह सुनहरा प्रकाश - ज्ञान किरण, भरी प्रश्नों साथ। किसी पुस्तक में न छपे उत्तर इसके, न क...