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शनिवार, 23 सितंबर 2017

चंद शेर..........बशीर बद्र


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये ।
.....
ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं 
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है । 
.....
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता । 
.....
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों । 
.....

एक दिन तुझ से मिलनें ज़रूर आऊँगा 
ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये ।
.....

इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी 
लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे । 
 .....
वो ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है 
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे । 
..... 
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलानें में। 
 .....
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी, 
आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते । 
..... 
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था. 
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला ।
 .....
मैं इतना बदमुआश नहीं यानि खुल के बैठ 
चुभने लगी है धूप तो स्वेटर उतार दे ।

-बशीर बद्र

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

मैं, कीर्ति, श्री, मेधा, धृति और क्षमा हूं......स्मृति आदित्य


एक मधुर सुगंधित आहट। 
आहट त्योहार की। 
आहट रास, उल्लास और श्रृंगार की। 
आहट आस्था, अध्यात्म 
और उच्च आदर्शों के प्रतिस्थापन की। 
एक मौसम विदा होता है और 
सुंदर सुकोमल 
फूलों की वादियों के बीच 
खुल जाती है श्रृंखला 
त्योहारों की। 
श्रृंखला जो बिखेरती है 
चारों तरफ खुशियों के 
खूब सारे खिलते-खिलखिलाते रंग।
हर रंग में एक आस है, 
विश्वास और अहसास है। 
हर पर्व में संस्कृति है, 
सुरूचि और सौंदर्य है। 
ये पर्व न सिर्फ 
कलात्मक अभिव्यक्ति 
के परिचायक हैं, 
अपितु इनमें गुंथी हैं, 
सांस्कृतिक परंपराएं, 
महानतम संदेश और 
उच्चतम आदर्शों की 
भव्य स्मृतियां। 
इन सबके केंद्र में सुव्यक्त होती है 
-शक्ति। 
उस दिव्य शक्ति के बिना 
किसी त्योहार, 
किसी पर्व, 
किसी रंग और 
किसी उमंग की 
कल्पना संभव नहीं है।

-स्मृति आदित्य

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

टूटकर फूल शाखों से....श्वेता सिन्हा



टूटकर फूल शाख़ों से झड़ रहे हैं।
ठाठ ज़र्द पत्तों के उजड़ रहे हैं।।

भटके परिंदे छाँव की तलाश में
नीड़ोंं के सीवन अब उधड़ रहे हैं।

अंजुरी में कितना जमा हो ज़िदगी
बूँद बूँद पल हर पल फिसल रहे हैं।

ख़्वाहिशों की भीड़ से परेशान दिल
और हसरतें आपस में लड़ रहे हैं।

राह में बिछे फूल़ो का नज़ारा है
फिर आँख में काँटे कैसे गड़ रहे हैं।

      #श्वेता🍁

बुधवार, 20 सितंबर 2017

यहां जो हादसे कल हो गए हैं....नासिर काजमी

तेरे मिलने को बेकल हो गए
मगर ये लोग पागल हो गए हैं

बहारें लेके आए थे जहां तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गए हैं

यहां तक बढ़गए आलम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गए हैं

कहां तक ताब लाए नातवां दिल
कि सदमें अब मुसलसल हो गए हैं

उन्हें सदियों न भूलेगा जमाना
यहां जो हादसे कल हो गए हैं

जिन्हें हम देख कर जीते थे नासिर
वो लोग आंखों से ओझल हो गए हैं
- नासिर काजमी..

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

क़लन्दर तो ज़मीं पर बैठते हैं.....राज़िक़ अंसारी

चलो चल कर वहीं पर बैठते हैं
जहां पर सब बराबर बैठते हैं

न जाने क्यों घुटन सी हो रही है
बदन से चल के बाहर बैठते हैं

हमारी हार का ऐलान होगा
अगर हम लोग थक कर बैठते हैं

तुम्हारे साथ में गुज़रे हुए पल
हमारे साथ शब भर बैठते हैं

बताओ किस लिये हैं नर्म सोफ़े 
क़लन्दर तो ज़मीं पर बैठते हैं

तुम्हारी बे हिसी बतला रही है
हमारे साथ पत्थर बैठते हैं 

सोमवार, 18 सितंबर 2017

प्रिय सुध भूले री......महादेवी वर्मा

1907-1987

प्रिय सुध भूले री, मैं पथ भूली 
मेरे ही मृदु उर में हंस बस 
सांसों में भर मादक मधु रस 
लघु कलिका के चल परिमल से 
ये नभ छाये री मैं वन फूली 


तज उनका गिरि सा गुरु अंतर 

मैं सिक्ताकण सी आई झर 
आज सजन उनसे परिचय क्या 
ये नभ चुम्बित मैं पद धूली 


उनकी वीणा की मृदु कम्पन 

डाल गई री मुझमें जीवन 
खोज ना पाई अपना पथ मैं
प्रतिध्वनि सी सूने में गूंजी 
प्रिय सुध भूले री मैं पथ भूली ~
       
~ महादेवी वर्मा

रविवार, 17 सितंबर 2017

भीड़ हमसे दूर जाती है....अज्ञात

जो मुहब्बत में दर्द पाते हैं
उनके दिल में खुदा आते हैं

सोचकर हम कुछ नहीं कहते
जो दिल में है, कह जाते हैं

भीड़ हमसे दूर जाती है
और हम तन्हा रह जाते हैं

चांद संग दो कदम चलकर
बीते दिन हमको याद आते हैं   
रचनाकारः अज्ञात 

चंद शेर..........बशीर बद्र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये । ..... ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़म...