फ़ॉलोअर

यादें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
यादें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

यूँ न था बिखरना

यूँ न टूटकर, असमय था बिखरना मुझे...

छोड़ कर यादें, वो तो तन्हा चला,
तोड़ कर अपने वादे, यूँ कहाँ वो चला,
तन्हाइयों का, ये है सिलसिला,
यूँ इस सफर में, तन्हा न था चलना मुझे!

यूँ न टूटकर, असमय था बिखरना मुझे...

कली थी, अभी ही तो खिली थी!
सजन के बाग की, मिश्री की डली थी!
था अपना वही, एक सपना वही,
यूँ न बाहों से उनकी, था निकलना मुझे!

यूँ न टूटकर, असमय था बिखरना मुझे...

गुजर चुके अब, सपनों के दिन,
अब गुजरेंगे कैसे, वक्त अपनों के बिन,
न था वास्ता, तंज लम्हों से मेरा,
यूँ तंग राह में अकेले, न था गुजरना मुझे!

यूँ न टूटकर, असमय था बिखरना मुझे...

- पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

कैसे कहूं अपना....सीमा 'सदा'


कुछ बातों को करीने से लगाकर, 
वो जाता है अक़्सर मुझे बहलाकर ।

कीमती हैं मेरे पास यादें तुम्हारी 
इनको रखा है त़ह पे त़ह लगाकर ।

खोज़ना है किसी अपने को पर 
गया है वो चेहरे पे चेहरा लगाकर ।

बेगाना तो नहीं पर कैसे कहूं अपना, 
जो गया है मुझे अज़नबी बनाकर ।
-सीमा 'सदा'

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...