
सुना -अनसुना
कर
हर पल गुजरता
क्या किस्सा
कहे उनकी
बेरुखी का !
उमर का
सफीना
साहिल पे डूबा
जमाना भी था
तब दिल्लगी का !
साँसो की
बेचैनियाँ
क्या कहे हम
लगता था
चक्कर जो
उनकी गली का !
मेरी
इस खता को
ना हँस कर
उड़ाओ
किस्सा है
ये मेरी
बेबसी का !
चाहा
बता कर
दिल हल्का
कर ले
मखौल का
सबब
बना ये
गमी का !
डॉ. इन्दिरा