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सोमवार, 20 नवंबर 2017

जमाना भी था तब दिल्लगी का...डॉ. इन्दिरा


सुना -अनसुना 
कर
हर पल गुजरता 
क्या किस्सा 
कहे उनकी 
बेरुखी का ! 
उमर का
सफीना 
साहिल पे डूबा 
जमाना भी था 
तब दिल्लगी का ! 
साँसो की 
बेचैनियाँ
क्या कहे हम 
लगता था 
चक्कर जो 
उनकी गली का !
मेरी
इस खता को 
ना हँस कर
उड़ाओ 
किस्सा है 
ये मेरी
बेबसी का !
चाहा
बता कर 
दिल हल्का 
कर ले 
मखौल का
सबब
बना ये 
गमी का ! 
डॉ. इन्दिरा 

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