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गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े...कैफ़ी आज़मी

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े

जिस तरह हंस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-गम
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े
[नशेब=उतार ; फ़राज़=चढ़ाव ]

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

साकी सभी को है गम-ए-तश्नालबी मगर
मय है उसी के नाम पे जिस के उबाल पड़े

-कैफ़ी आज़मी

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