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शनिवार, 4 नवंबर 2017

रानी पदमावती.....नीतू ठाकुर

एक हाथ में विष का प्याला 
एक हाथ में धरी कटार 
आज तजेंगे प्राण मगर 
दुश्मन से ना मानेंगे हार 
क्या समझ रहे थे तुम अबला 
जो हाथों में आ जायेंगे 
हम वीर शेरनी की जाई 
हम तुमको धुल चटायेंगे 
है लाज शरम गहना माना 
घूँघट में शीश छुपाते है 
पर वक़्त पड़े तो बन काली 
राण में तलवार चलाते है 
नासमझ समझ का फेर है ये 
हम दास तेरे हो जायेंगे 
यदि वक़्त पड़ा तो अग्नि पे 
जौहर का खेल दिखायेंगे 
ये हिन्द देश की छत्राणी 
ना कदम हटायेंगी पीछे 
तू कदम बढ़ा के देख जरा 
कुचलेंगें क़दमों के निचे 
तुझ जैसे नीच नराधम को 
हम कभी शरण ना आयेंगे  
पग आज बढ़ा के देख जरा 
तुझको औकात दिखायेंगे 
राज महल की दीवारों को 
हम शमशान बनायेंगे 
धरती माँ की आन की खातिर 
अपनी चिता जलायेंगे 
शर्म लुटाके जीने से 
बेहतर होती है वीरगती 
जब तक थे तन में प्राण 
यही कह रही थी रानी पदमावती    
   -नीतू ठाकुर 
**अमर उजाला व काव्यालय
में प्रकाशित रचना







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