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बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

मन के पलाश...................निशा माथुर

एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम।

सुनो, तुम जरा मेरे साथ तो आओ,
कुछ मौसमों को भी बुला लाओ।
मैं ...... मैं बादल ले आऊं,
और इस भीगी-भीगी शाम में,
गुलमोहरी मधुमास चुराऊं।

सुनो, तुम आज कुछ बिगड़ो, कुछ बनो, 
और आंधियां भी संग ले आओ।
मैं........मैं चिराग बन जाऊं,
और इस आंधी संग जल-जल के,
अपना विश्वास आजमाऊं।

सुनो, तुम कुछ पल पहाड़ बन जाओ, 
और सन्नाटे से लहरा जाओ।
मैं........मैं धुंधला के सांये-सी मचलूं, 
सन्नाटे में तुम्हारा नाम पुकारूं।

सुनो, तुम आज वक्त बन जाओ,
और मेरे लिए थोड़े ठहर जाओ।
मैं............मैं फिर स्मृतियां छू लूं,
दर्पण में अनुरागी छवियां निहार लूं।

सुनो, तुम आज मेरा आंगन बन जाओ,
और मेरा सपना बनकर बिखर जाओ।
मैं...मैं मन के पलाश-सी खिल जाऊं, 
अनुरक्त पंखुरी-सी झर-झर जाऊं।

सुनो, फिर एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम ।
मैं........तुम्हारी आंखों के दो मोती चुराऊं
और उसमें अपना चेहरा दर्ज कराऊं।
-निशा माथुर

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

ओछी मानसिकता......आरती चित्तौड़ा

         
        हेलो मैडम, अचानक आगे हाथ बढ़ाते हुए बॉस ने स्वागत किया। आफिस का पहला दिन था सभी ने गर्मजोशी से काम की जिम्मेदारी और रूल्स समझाए।

        न्यूकमर थी,........... इसलिए सभी सीनियर कुछ न कुछ काम बताने के लिए मेरे पी सी पर आ जाते। शुरुआत में यह सब अच्छा लगा। सोचा इन सब के अनुभव से काम में परफेक्शन आ जाएगा। पर यह क्या सीट पर आते ही बालों में हाथ घुमा देते और कभी-कभार हंसी मजाक में गाल को भी टच कर देते। यह सब हैरान और अचंभित करने वाला था।
  
कहने को तो मैं तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों के 
साथ काम कर रही थी। लेकिन यह स्पर्श उनकी 
ओछी मानसिकता को उजागर करता है।

-आरती चित्तौड़ा

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...