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सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

अभंगित मौन .............चन्द्र किशोर प्रसाद


मूक होकर मौन धारण करूँ कब तक, 
लाली लायी अब अरुण फिर
बन गया है वीर काफ़िर 
मैँ बनूँ काफ़िर कब तक;

डर है तुमको झँझावातोँ से
डर है मुझको सूनी रातोँ से 
औँधे कटोरे के सितारे 
मैँ तो गिनता रहूँ कब तक;

तुम अभी कोमल प्रवाहिनी हो 
किंतु मेरे मन मन्दिर की रागिनी हो 
हाथ मेँ वीणा लिये मैँ 
तेरी प्रतिक्षा करूँ कब तक।

मूक होकर मौन धारण करूँ कब तक .

-चन्द्र किशोर प्रसाद

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