प्यास की शिद्दत बढ़ी है आजकल
जबके आँखों में नदी है आजकल
मुस्कुराए बिन चले जाते हो तुम
ऐसी भी क्या बेबसी है आजकल
वस्ल की बेचैनियाँ जाती रहीं
इस सिफ़त की दोस्ती है आजकल
आजकल छत पर ही आ जाता है चाँद
इसलिए कुछ ताज़गी है आजकल
शह्र की सड़कें खचाखच हैं भरी
तन्हा फिर भी आदमी है आजकल
तुम उगलते थे जिसे वह ज़ह्र भी
हद से ज़्यादा क़ीमती है आजकल
उनका रुत्बा, उनकी ख़ुशियाँ उनकी ठीस
अपनी तो लाचारगी है आजकल
क्यूँ लगे है यूँ के मानिंदे क़फ़न
ज़िन्दगी भी ओढ़ती है आजकल
कर रहे ग़ाफ़िल जी तुम भी शाइरी
पागलों की क्या कमी है आजकल
