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बुधवार, 29 नवंबर 2017

सर्द सुबह.......फुरुषोत्तम कुमार सिन्हा

कहीं धूँध में लिपटकर, खोई हुई सी हैं सुबह,
धुँधलाए कोहरों में कहीं, सर्द से सिमटी हुई सी है सुबह,
सिमटकर चादरों में कहीं, अलसाई हुई सी है सुबह,
फिर क्युँ न मूँद लूँ, कुछ देर मैं भी अपनी आँखें?
आ न जाए आँखों में, कुछ ओस की बूंदें!

ओस में भींगकर भी, सोई हुई सी है सुबह,
कँपकपाती ठंढ में कोहरों में डूबी, खोई हुई सी है सुबह,
खिड़कियों से झांकती, उन आँखों में खोई है सुबह,
फिर क्युँ न इस पल में, खुद को मैं भी खो दूँ?
जी लूँ डूब कर, कुछ देर और इस पल में!

फिर लौटकर न आएगी कोहरे में डूबी ये सुबह,
शीत में भींग-भींगकर फिर न थप-थपाएगी ये सुबह,
सर्दियों की आड़ में फिर न बुलाएगी ये सुबह,
फिर क्युँ न मैं भी हो लूँ, इन सर्द सुबहो संग?
बाँट लूँ गर्म साँसें, देख लूँ कुछ जागे सपने!





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