
तेज हवाओं में
जब झांकता हूँ खिड़की से उस ओर
तो इन पेड़ों के नृत्य में
तलाशता हूँ कुछ,
उसी समय आसमान में
बहते बादलों में
मिलता है एक अक्स
हू-ब-हू तुम जैसा
आँखें, नाक, कान और बाल।
और वो अक्स
बादलों पर सवार होकर
जा रहा है दूर
बहुत दूर
उसके पीछे भागना मेरे बस में कहां
बस देखता रहूंगा
तब तक जब तक
आँखों से ओझल नहीं हो जाता।
-राकेश पत्थरिया 'सागर'