भोजपुरी को सदा अनदेखा किया गया है।
किसानोंकी व्यथा, वहां की नारियों की व्यथा
पर रचनाएँ लिखी जातीं हैं
परन्तु भोजपुरी में बहुत कम पढ़ने में आती है।
आपके समक्ष भोजपुरी में ये रचना प्रस्तुत कर रही हूँ
प्रतिक्रिया की इच्छुक रहूंगी।
मैं तो चिरइया बाबुल तोरे आँगन की,
नान्हीं उमर खुरच खुरच दाना निकालू ,
भुखिया सतावे बापू ,होठवा पे संतोष मुस्काये,
अंगना में टुकुर - टुकुर देखे पाखी-
थाली क चउरा ,मनवा विकल होई जाये,
मिलि बैठी भुखिया मिटवली बापू ,
दाता से पूछी ला एक ही सवलिया
"गरीबन के जिनगी में काहे लिखला-
भूखिया - पियसिया, आँसूवन क धरिया !!
-उर्मिला सिंह
