फ़ॉलोअर

अज्ञात रचनाकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अज्ञात रचनाकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

कलियों का मुस्कुराना....अज्ञात


आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना;
वो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना;

आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की;
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना;

लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम;
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना;

वो प्यारी-प्यारी सूरत, वो कामिनी-सी मूरत;
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना।
-श़ायर अज्ञात

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...