आन बसों तुम मोरी नगरिया,
हे घट घट के वासी
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
कान्हा तुम हो प्यार का सागर,
फिर क्यूँ सुनी मोरी गागर,
कौन कसूर भयो रे मोसे,
जो मै रह गई प्यासी,
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
जिन नैनों में कृष्ण बसे हों,
उन नैनों में कौन समाये,
नैना तेरे दरस को तरसे,
पागल मन कैसे समझायें,
एक झलक दिखला दो कन्हैया,
कर दो दूर उदासी,
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
तुम तो हो छलिया बनवारी,
नैन मिलाके सब कुछ हारी,
तुम बैठे मथुरा में जाकर,
मन रोये अब रतिया सारी,
रोते रोते प्राण तजूँगी,
देर ना करना जरासी,
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
सूना मधुबन, सुना पनघट,
आज ना मै छोडूंगी ये हठ,
हर पल तेरी याद सताये,
कान्हा तुम कैसे बिसराये,
तुम हो गोकुल वासी
कन्हैया मोरे छोड़ के मथुरा-काशी
- नीतू ठाकुर
