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शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018
रविवार, 7 जनवरी 2018
स्त्री विमर्श पर .....नीरज द्विवेदी

स्त्री विमर्श पर
मेरे सारे तर्क,
सारा ज्ञान,
सारा पौरूष,
चुक जाता है
शब्द टूटने लगते हैं..
मै, निरूत्तरित.. आवाक
तुम्हे देखने लगता हूँ.....
जब तुम बड़ी सहजता से पूछ लेती हो,
कि...
"मै औरत हूँं,
पर.... मै हूँ कौन ??

-नीरज द्विवेदी
मंगलवार, 2 जनवरी 2018
दिल के चीरों की बात करते हैं.....केशव शरण
ज्यों लकीरों की बात करते हैं
दिल के चीरों की बात करते हैं
ये तड़प तो वचन ही दे सकते
आप तीरों की बात करते हैं
हम बुरे थे सुनी-सुनाई पर
अब नज़ीरों की बात करते हैं
जो बजे ही नहीं हैं मुद्दत से
मन-मजीरों की बात करते हैं
आत्माएं मरा करें जिन पर
उन शरीरों की बात करते हैं
इश्क़ में हो गये निकम्मे जो
उन फ़क़ीरों की बात करते हैं
जो समझते हैं प्यार को दौलत
उन अमीरों की बात करते हैं
खा गये मात जो पियादों से
उन वज़ीरों की बात करते हैं
-केशव शरण
रविवार, 19 नवंबर 2017
तुम नहीं होती तो........डॉ. विनीता राहुरिकर
तुम नहीं होती तो
अलसाया रहता है
खिड़की का पर्दा
सोया रहता है देर तक
सूरज से नजरें चुराता...,
तुम नहीं होती हो तो
उदास रहता है
चाय का कप
अपने साथी की याद में....
साथ वाली कुर्सी भी
अपने खालीपन में
बैचेनी से
पहलू बदलती रहती है.....
रात में तकिया
बहुत याद करता है
तुम्हारी बेतरतीब
उनींदी बिखरी लटों
और निश्चिंत साँसों की
उष्मीय आत्मीयता को....
तुम नहीं होती तो
क्या कहूँ
मेरा हाल भी कुछ
पर्दे, कप, कुर्सी
और रात में
तकिये जैसा ही होता है....

-डॉ. विनीता राहुरिकर
अलसाया रहता है
खिड़की का पर्दा
सोया रहता है देर तक
सूरज से नजरें चुराता...,
तुम नहीं होती हो तो
उदास रहता है
चाय का कप
अपने साथी की याद में....
साथ वाली कुर्सी भी
अपने खालीपन में
बैचेनी से
पहलू बदलती रहती है.....
रात में तकिया
बहुत याद करता है
तुम्हारी बेतरतीब
उनींदी बिखरी लटों
और निश्चिंत साँसों की
उष्मीय आत्मीयता को....
तुम नहीं होती तो
क्या कहूँ
मेरा हाल भी कुछ
पर्दे, कप, कुर्सी
और रात में
तकिये जैसा ही होता है....

-डॉ. विनीता राहुरिकर
शुक्रवार, 3 नवंबर 2017
चाँद आ तो गया मेरे घर में....मनी यादव
मौत को अपना आशना रक्खें
ज़िन्दगी से भी वास्ता रक्खें
चाँद आ तो गया मेरे घर में
चाँदनी इसकी हम कहाँ रक्खें
शाइरी सुनना कोई खेल नहीं
शेर पर ही मुलाहिज़ा रक्खें
प्यास दरिया बुझा नही सकता
इसलिए पास में कुआँ रक्खें
पेड़ तहज़ीब का पड़ा जख़्मी
पूर्वजों इसपे कुछ दुआ रक्खें
तू बुलंदी दिखा रहा मुझको
ज़ेब में हम तो आसमाँ रक्खें
-मनी यादव
शुक्रवार, 15 सितंबर 2017
मिट न सकी...अंशू सिंह

मिट न सकी
अंतहीन भूख
अभ्यंतर से
मेरे अभ्यंतर से
बार बार पुनः
जन्म हुआ
चाहिये मुझको
भरपाई
तृप्त भरपाई
संकीर्ण से अनंत
तक की प्यास
पुनः बुझानी है
कालविजयी दशाओं में
अक्सर भूखा था
उस रोज़
और प्यासा था
जब फूटती थी
एक विशाल नदी
प्रवाही मन से
निशब्द है ज़ुबान
आज
भूख व्यक्त नही करती
उगती है
विलीन हो जाती है
पर हर पहलू
एक भूख है
अंतहीन भूख
-अंशू सिंह
जन्म 30 अक्टूबर 1987
वाराणसी काशी हिन्दू वि वि
से स्नातक एवं स्नातकोत्तर
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