
ये उर्वर पृथ्वी,
ये खुला आकाश,
ये बहती हवाऐं,
ये जलती आग,
ये बहता पानी,
ये तैरती मछलियाँ
ये सुबह उठता सूरज,
ये रात बिताता चांद,
ये इतराती तितलियां,
ये शहद बनाती मक्खियां,
ये मदमस्त हाथी,
ये व्यस्त चीटियां,
ये जाल बुनतीं मकड़ियां,
ये कुलांचे भरते हिरन,
ये चहचहाती चिड़ियां,
ये अबोध बच्चे,
ये बर्बर शिकरी,
ये जहरीले सांप,
ये सब गुरू ही तो हैं।
इन सब गुरुओं के रहते
हमें अन्य गुरु की आवश्कता ही
कहाँ होती है
-अलकन्दा दीदी