विश्वास घात सा कर रहे
मानव तुम अपने ही साथ
जनम से लेकर मरण तक
मैं हरदम देता तेरा साथ !
मात नहीं पर मात सरीखा
नेह सदा करता
पितृ हस्त की तरह सदा
सर पर छाया रखता !
भाई बहन के निश्छल बंधन सा
अपना अटूट है नाता
और दोस्त सी वफा बराबर
पूरे जीवन करता !
इतना ही नहीं फल फूल सदा
तेरे लिये उगाता
तू खाता हर्षित मेरा मन
द्विग्णित भाव उपजता !
श्वास श्वास मुझसे स्पंदित
स्वच्छ वायु मुझसे पाता
मुझे काट क्या सुख पायेगा
अपना तो आदि काल से नाता !
मत बैठो उस ढहती कगार पर
ना पतन की राह निकालो
मेरा क्या मैं काष्ठ निर्जीव
तुम अपना तो भला विचारों !
एक कटे और दस उगे
फिर पांच से पचास
पीढ़ी दर पीढ़ी यही सुमारग
दिखलाओ इंसान !
डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍
