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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

मर-मर के जीने वाले.........डॉ. अमिताभ विक्रम द्विवेदी

मर-मर के जीने वाले क्या जाने क़ज़ा क्या है,
सुरुर के दीवाने ना जाने खुमारी का मज़ा क्या है।

मेरे ही घर में करता है मुझे मारने की साज़िश,
जब मिलता है पूछता है कि तुझे फ़िक्र क्या है।

ईंट मिट्टी की इमारत को लोगों ने बनाया घर,
उसी को बाँट कर पूछते हैं कि तू कौन क्या है।

ज़िन्दगी जीने का सलीका उसे ना आ सका,
मरने पे पूँछता है मेरी मौत की वजह क्या है।

आदमी को आदमी की गंध सुहाती नहीं,
दीवारों से पूछता है वीराने की वजह क्या है।

- डॉ. अमिताभ विक्रम द्विवेदी

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