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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

मर-मर के जीने वाले.........डॉ. अमिताभ विक्रम द्विवेदी

मर-मर के जीने वाले क्या जाने क़ज़ा क्या है,
सुरुर के दीवाने ना जाने खुमारी का मज़ा क्या है।

मेरे ही घर में करता है मुझे मारने की साज़िश,
जब मिलता है पूछता है कि तुझे फ़िक्र क्या है।

ईंट मिट्टी की इमारत को लोगों ने बनाया घर,
उसी को बाँट कर पूछते हैं कि तू कौन क्या है।

ज़िन्दगी जीने का सलीका उसे ना आ सका,
मरने पे पूँछता है मेरी मौत की वजह क्या है।

आदमी को आदमी की गंध सुहाती नहीं,
दीवारों से पूछता है वीराने की वजह क्या है।

- डॉ. अमिताभ विक्रम द्विवेदी

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

शब्दों तुम बरसो.....डॉ. प्रभा मुजुमदार


चुपचुप धीमे-से रुकते, 
झिझकते मत बुदबुदाओ।
डर और सन्नाटे में
संगीत बन मत गुनगुनाओ।
शब्दो! तुम बन जाओ
हथौड़ों की गूंज।
ठक-ठक कर हिलाते रहो;
जंग लगे बन्द दरवाज़ों की चूल।

बजो तो तुम नगाड़ों की तरह,
कि न कर पाये कोई बहरेपन का स्वांग।   
शब्दों तुम बरसो, 
बारिश की फुहार बन कर;
अरसे से बंजर पड़ी 
धरती पर, अरमान बन लहलहाओ।
ठस और ठोस
संकीर्ण और सतही,
मन की जड़ता को
तुम पंख दो शब्दो।

आकाश की तरलता में उड़ते रहें स्वप्न।
विस्तारती रहे सोच।
धूमकेतुओं की तरह
पड़ताल करती रहें नक्षत्रों की।

शब्दो! तुम काग़ज़ पर उकेरी गई
बेमतलब रेखाएं नहीं।
गढ़ो नई परिभाषाओं को।

-डॉ. प्रभा मुजुमदार

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

तेरे प्रेम में, तेरी प्रीत में........अयान सुरोलिया


तेरी जुल्फों की छाँव में 
तेरी प्यार भरी निगाह में
तेरे हँसने में, तेरे रोने में
तेरा पल भर के लिए, मेरी बाहों में सोने में 
मैं जीवन पा लूँगा, सोचा न था।

तेरे प्रेम में, तेरी प्रीत में
तेरी हार में, तेरी जीत में
तेरी चहकती हुई वाणी के
मधुप्रिय संगीत मे
मैं जीवन पा लूँगा, सोचा न था।

तेरे हौले से मेरे गालों को चूमने में
तेरे डांटने में,तेरे छूने में
मेरे शीतरात्री जैसे, जीवन के सूने में
मैं जीवन पा लूँगा, सोचा न था।

तेरे प्यार से मेरे गालों को सहलाने में
तेरे रूख को परेशां करती, उन जुल्फों को हटाने में
तेरी मीठी सी शरारत में
तेरे आलिंगन की हरारत में
मैं जीवन पा लूँगा, सोचा न था।

हमारे प्रेम के प्रतीक,उन चादर की सिलवटों में
तुझसे लड़ने पर,उन बेचैन रातों की करवटों में,
तेरे होठों के ऊपर के तिल में
मेरे करीब आने पर, तेरे जोरों से धड़कते दिल में
मैं जीवन पा लूँगा, सोचा न था।

तुम साधना हो मेरी
तुम प्रीत हो मेरी
मेरी खोयी हुई नाव की साहिल हो तुम
मेरी इच्छाओ का अंत है,अगर हासिल हो तुम

न सोना हो तुम , ना ही हूर हो
तुम मेरा कोहिनूर हो
देखा है तुम्हे, छूआ है तुम्हे
महसूस भी किया है
फिर भी न जाने क्यू लगता है
तुम कल्पना हो मेरी।

जो जीवन पाया है तुमसे
जिसे ना सोचा था, ना जिसकी उम्मीद थी
उस जीवन की 
तुम प्रेरणा हो मेरी।

-अयान सुरोलिया

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

बस देखता रहूंगा....राकेश पत्थरिया 'सागर'


तेज हवाओं में
जब झांकता हूँ खिड़की से उस ओर
तो इन पेड़ों के नृत्य में
तलाशता हूँ कुछ,
उसी समय आसमान में
बहते बादलों में
मिलता है एक अक्स
हू-ब-हू तुम जैसा
आँखें, नाक, कान और बाल।
और वो अक्स
बादलों पर सवार होकर
जा रहा है दूर
बहुत दूर
उसके पीछे भागना मेरे बस में कहां
बस देखता रहूंगा
तब तक जब तक
आँखों से ओझल नहीं हो जाता।

-राकेश पत्थरिया 'सागर'

बुधवार, 3 जनवरी 2018

ढाई अक्षर.....रश्मि भटनागर


आज से सदियों पहले
शायद सृष्टि के समय
मैंने दिल की किताब से
कुछ अक्षर चुराये।
चोरी तो चोरी है - कभी पकड़ी ही जायेगी
घबराई सी मैं
उन अक्षरों को लेकर भटकती रही
फिर मैंने वो अक्षर
एक कली में छुपा दिए
अगले ही दिन
वो कली चटकी और फूल बनी
अब फिर डर लगा मुझे
सबको पता चल जायेगा
वहाँ से अक्षर उठा कर
मैंने फूल पर रख दिए
थोड़ी देर में ही वहाँ
भंवरे गुनगुनाने लगे
फिर वो अक्षर मैंने
चुपके से उठाये - और
आसमान में उछाल दिए
ये सब क्या हो गया
मैंने तो सिर्फ ढाई अक्षर ही चुराये थे
ये तो लाखों तारे बन गए
काश, मैं वो अक्षर अपने
दिल में ही रख लेती| 
-रश्मि भटनागर

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

शब्द अब बिकने लगे है....श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


शब्द अब
बिकने लगे है मंडियों में उत्पाद बन कर.
और बिचौलियों के समूह आ खड़े होते हैं 
उनके दाम आंकने के लिये,
अपने-अपने लेबल और अपनी पैकिंग के साथ!
स्तुति और प्रशस्तियों के ख़ुशामद 
और गिड़गिड़ाहट के दम्भ 
और दावों के शब्दों के वार 
शब्दों की ढाल 
शब्दों की आग में 
शब्दों का घी।

सब कुछ बाज़ारू तरीके से 
आयोजित हो जाता है।
रैलियां और धरनें लूट और घेराव,
भजन-कीर्तन और फैशन शो,
सांस्कृतिक और साहित्यिक जमावड़े भी।

हंसी और आँसू,
व्यंग्य और क्रोध,
प्रेम और अनुराग के शब्द, 
निर्देशित होकर
सही वक्त/ सही सांचे मे,
फिट किये जाने के बाद,
क्या भौंकना ही
मौलिक रह जायेगा।

-श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

व्यग्र आशायें....आनंद कुमार राय

आशायें मेरी आँखों में हैं
आज शिशु -सी उमड़ रही,
अभी-अभी पग दो ही चले 
और व्यग्र-व्यथित-सी घुमड़ रही।

अनजाना, अनजानी राह पे 
समझ भरा मेरा काम न था, 
ख़ैर, चलो मैं इस जीवन से 
जो हासिल कर पाया हूँ,  
है अभिमान जो कुछ करता मैं 
सब उस की आँखों में हैं 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।

अभी उठाया है पग मैंने 
चलने की शुरुआत की है,  
तम में घिरा हुआ था कल तक
दिन में नया प्रभात किया है।
सम मेरे गम की आंधी में 
कई जीवन है उजाड़ रही ,  
पर आशायें मेरी आँखों में 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।
-आनंद कुमार राय

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

सब्र से अब रहा नहीं जाता....विनीता तिवारी


बेबसी इस क़दर हुई बेबस
अश्क़ बनकर बहा नहीं जाता

हमने माँगा ही क्या, जो दे ना सके
सब्र से अब रहा नहीं जाता

उनकी ऊँची बहुत दुकान सही
पीर मौला कहा नहीं जाता

फ़र्क़ दिल में रहा, दिमाग में भी
उम्र का फ़ासला नहीं जाता

जा रहे चाँद पे, सितारों पे
दिल से दिल तक चला नहीं जाता

- विनीता तिवारी 

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...