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सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

व्यग्र आशायें....आनंद कुमार राय

आशायें मेरी आँखों में हैं
आज शिशु -सी उमड़ रही,
अभी-अभी पग दो ही चले 
और व्यग्र-व्यथित-सी घुमड़ रही।

अनजाना, अनजानी राह पे 
समझ भरा मेरा काम न था, 
ख़ैर, चलो मैं इस जीवन से 
जो हासिल कर पाया हूँ,  
है अभिमान जो कुछ करता मैं 
सब उस की आँखों में हैं 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।

अभी उठाया है पग मैंने 
चलने की शुरुआत की है,  
तम में घिरा हुआ था कल तक
दिन में नया प्रभात किया है।
सम मेरे गम की आंधी में 
कई जीवन है उजाड़ रही ,  
पर आशायें मेरी आँखों में 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।
-आनंद कुमार राय

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-10-2017) को
    "थूकना अच्छा नहीं" चर्चामंच 2753
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  3. आशायें मेरी आँखों में हैं
    आज शिशु -सी उमड़ रही,
    अभी-अभी पग दो ही चले
    और व्यग्र-व्यथित-सी घुमड़ रही..

    Waahhhhh। बहुत ही उम्दा

    उत्तर देंहटाएं

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