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रविवार, 8 अक्तूबर 2017

इस नदी की धार से.....दुष्यंत कुमार



इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

-दुष्यंत कुमार

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति।
    युवा दिलों के चाहते कवि-शायर दुष्यंत कुमार हिंदी ग़ज़ल को स्थापित किये जाने के लिए जाने जाते हैं।

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  2. एक ऐसे शायर की रचना जैसा आज तक न तो कोई हुआ है, न हो सकता है. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  3. एक ऐसे शायर की रचना जैसा आज तक न तो कोई हुआ है, न हो सकता है. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  4. सर्वप्रथम आदरणीय ,दुष्यंत कुमार जी को कोटि -कोटि नमन। साहित्य के सच्चे साधक जिनकी रचनायें अभी कल की ही बात लगती हैं। जो आज के समय में उतनी ही सार्थक व तर्कसंगत हैं जितनी उस समय हुआ करती थी। आभार "एकलव्य"

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