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शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

तेरा साथ प्रिय....श्वेता सिन्हा

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जीवन सिंधु की स्वाति बूँद
तुम चिरजीवी मैं क्षणभंगुर,
इस देह से परे मन बंधन में
मादक कुसुमित तेरा साथ प्रिय।

पल पल स्पंदित सम्मोहन
दृग छू ले तो होती सिहरन,
विह्वल उर की व्याकुलता
अंतस तृप्ति तेरा साथ प्रिय।

अव्यक्त व्यक्त भावों का गीत
विस्मृत स्वप्नों के तुम मनमीत,
कंटक से भरे जीवन पथ पर
मृदु मोरपंखी तेरा साथ प्रिय।

स्वर्ण मृग जग छलती माया में
क्षण क्षण मिटती इस काया में,
निशि कानन के विस्तृत अंचल 
रवि किरणों सा तेरा साथ प्रिय।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सृजन के नए सोपान तय करती आपकी लेखनी नित नए रंग बिखेर रही है। रचना में माधुर्य और लालित्य अद्भुत संगम है। करवा चौथ की पूर्व संध्या पर यह पावन रचना करोड़ों दिलों की धड़कन बन गई है। लिखते रहिए। बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  2. पूर्ण काव्यात्मक मनोहारी रचना। बहुत बहुत बधाई।

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  3. रचना में आपकी शब्द संपदा और भाषा की विलक्षणता झलकने लगी है. यह समझ रहा है कि आप हिंदी में एम ए या पीएच डी/ डी फिल किए हुए हैं. आगे बढ़ते रहें. पर भाषा जनसाधारण की हो तो शायद पाठकों पर ज्यादा असर करेगी.
    ऐसी रचना का साझेदार बनाने हेतू अत्यंत आभार.
    अयंगर

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  4. मनमोहक शब्दावली से सजी पूर्ण प्रेम को समर्पित आपकी ये रचना मन को छू गयी श्वेता बहन |इसमें रचे प्रेम की गाथा को नमन !!!!!!!!!और आपकी विलक्ष्ण रचनात्मकता को भी |

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (09-10-2017) को
    "जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध" (चर्चा अंक 2751)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    करवाचौथ की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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लफ्ज बिखरे है ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

मसि बहती  हिय पन्नॊं पर  कहीँ कम  कहीँ ज्यादा ! पन्ना गीला  गीला सा है  कहीँ कम  कहीँ ज्यादा ! मन भी तन्हा दुखा उम्र भर  कहीँ ...