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मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

कसमों की बंदिश....... श्वेता सिन्हा

रह रह छलकती ये आँखें है नम।
कसमों की बंदिश है बाँधे कदम।।

गिनगिन के लम्हों को कैसे जीये,
समझो न तुम बिन तन्हा है हम।

सजदे में आयत पढ़ूँ भी तो क्या,
रब में भी दिखता है तू ही सनम।

सुनो, ओ हवाओं न थामो दुपट्टा,
धड़कन को होता है उनका भरम।

मालूम हो तो सुकूं आये दिल को,
तुम बिन बिताने है कितने जनम।

ज़िद में तुम्हारी लुटा आये खुशियाँ,
गिन भी न पाओगे इतने है ग़म।


       #श्वेता🍁

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

मजमा.....राजेश "ललित" शर्मा


मजमा सजा है
मदारी ख़फ़ा है
बंदरिया के खेल का
अपना ही मजा है
लोग खड़े हैं
जादु बड़े हैं
हवा में से आयेगा रुपैया
साँप नाचेगा बीन पर थैया थैया

खेल सजेगा
नींबू कटेगा
ख़ून बहेगा
एक लड़का गिरेगा
फिर ख़ून बहेगा 
हाथ खोल दो
नहीं तो लड़का मरेगा
मदारी कहेगा
मंच सजेगा
बच्चा लोग ताली बजायेंगें
बड़े लोग बटुआ संभालेंगे
मदारी नोट के नम्बर बतायेगा
सब ख़ुश हो जायेंगे

पुलिस वाला आयेगा
डंडा बजायेगा
मदारी पचास का नोट थमायेगा
नया खेल दिखायेगा
छोटी सी लड़की आयेगी
दो बाँसों में रस्सी कसेगी
पाँव में रस्सी फंसेगी
रस्सी पर टंगेगी।
भीड़ होंठों पर हाथ रखेगी
अब गिरी के तब गिरी
कुछ नहीं होता
लड़की नीचे 
सब बजाओ ताली
बच्चों की जेब ख़ाली
बड़ों ने फिर पर्स निकाला
नया नोट जुगाड़ा
खुले नहीं का बहाना लगाया
सिक्का निकाला
हवा में उछाला
मदारी ने लपका
खेल ख़त्म 
पाँच साल पूरे हुये

सारे जुटना अगली गली
नया मदारी आयेगा
पुराने का सगा नहीं होगा
हवा में पैसा बनायेगा
लपक लेना सब
हवा का पैसा हवा में रहेगा
यूँ ही चलेगा 
वह नया खेल दिखायेगा
पापी पेट का सवाल है भाई
-राजेश "ललित" शर्मा

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

कहती है मुझसे मधुशाला...नीतू ठाकुर


कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला, तू मेरा स्वीकार ना कर

इज्जत, शोहरत,सुख और शांति किस्तों में लुट जाती है 
मिट जाती है भाग्य की रेखा जब मुझसे टकराती है
पावन गंगा जल भी मुझमे मिलकर विष बन जाता है 
जो भी पीता है ये प्याला नशा उसे पी जाता है 
   
 कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला, तू मेरा स्वीकार ना कर

मेरी सोहबत में ना जाने कितने घर बर्बाद हुए
छोड़ गए जो तनहा मुझको वो सारे आबाद हुए 
ऐसा दोष हूँ जीवन का जीवन को दोष बनाती हूँ 
प्रीत लगाता है जो मुझसे उसका चैन चुराती हूँ  

कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला, तू मेरा स्वीकार ना कर

भूले भटके जग से हारे पास मेरे जब आते है 
मीठे जहर के छोटे प्याले उनका मन ललचाते है 
बाहेक गया जो इस मस्ती में उसका जीवन नाश हुआ 
समझ ना पाया वो खुद भी कैसे वो इसका दास हुआ 

कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला, तू मेरा स्वीकार ना कर

गाढे मेहनत की ये कमाई ऐसे नहीं लुटाते है 
लड़ते है हालत से डटकर वही नाम कर जाते है 
बाहेक नहीं सकता तू ऐसे तू घर का रखवाला है 
एक तरफ है जीवन तेरा एक तरफ ये प्याला है 

कहती है मुझसे मधुशाला, मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर
                                  
 -नीतू रजनीश ठाकुर 

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

सदियों से इन्सान यह सुनता आया है / साहिर लुधियानवी




सदियों से इन्सान यह सुनता आया है
दुख की धूप के आगे सुख का साया है

हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो
हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है

झूठ तो कातिल ठहरा उसका क्या रोना
सच ने भी इन्सां का ख़ून बहाया है

पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं
इस मक़तल में कौन हमें ले आया है

अव्वल-अव्वल जिस दिल ने बरबाद किया
आख़िर-आख़िर वो दिल ही काम आया है

उतने दिन अहसान किया दीवानों पर
जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है


शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

रो रहा आसमाँ ये जमीं देखकर.....नीतू ठाकुर


रो रहा आसमाँ ये जमीं देखकर,
उसकी आँखों में बसती नमी देखकर,
इस कदर तेरे टुकडे किये क्या कहूं,
शर्म आती है ये आदमी देखकर,

लूट कर तेरी कीमत लगाते है जो,
खुद को दुनिया का मालिक बताते है जो,
खुद को इन्सान कहते है ये मतलबी,
उनमे इंसानियत की कमी देखकर,

रो रहा आसमाँ ये जमीं देखकर,
उसकी आँखों में बसती नमी देखकर,
इस कदर तेरे टुकडे किये क्या कहूं,
शर्म आती है ये आदमी देखकर,

जिनको आंचल में तुमने छुपाया कभी,
भूखे तन को निवाला खिलाया कभी,
आज आरी से काटे वो दामन तेरा,
जिनको सीने से तुमने लगाया कभी,

रो रहा आसमाँ ये जमीं देखकर,
उसकी आँखों में बसती नमी देखकर,
इस कदर तेरे टुकडे किये क्या कहूं,
शर्म आती है ये आदमी देखकर,

हर मुसीबत से जिनको बचाती है वो,
जिनके बारूद सीने पे खाती है वो,
रक्त से भर रहे है वो गोदी तेरी,
उनके गैरत की यूँ बेबसी देखकर,

रो रहा आसमाँ ये जमीं देखकर,
उसकी आँखों में बसती नमी देखकर,
इस कदर तेरे टुकडे किये क्या कहूं,
शर्म आती है ये आदमी देखकर,

कर्मयोगी,पतितपावनी ये धरा,
जिसके मन में दया,प्रेम,करुणा भरा,   
सुशोभित ,सुसज्जित थी वो,
आज अपनी ही नजरों में लज्जित थी वो,

रो रहा आसमाँ ये जमीं देखकर,
उसकी आँखों में बसती नमी देखकर,
इस कदर तेरे टुकडे किये क्या कहूं,
शर्म आती है ये आदमी देखकर,
 - नीतू रजनीश ठाकुर 

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

आँखों में.......तरुणा मिश्रा

है अयाँ दिल का हाल आँखों में..
पढ़ के देखो सवाल आँखों में ;

पूछते कम से कम तो ये इक बार..
क्यूँ ये डोरे हैं लाल आँखों में ;

जिन से बेचैनियाँ रहें दिन भर...
ख़्वाब ऐसे न पाल आँखों में ;

इन में रहती है तेरी परछाईं...
धूल तू तो न डाल आँखों में ;

वक्ते रुख़सत तो देखते मुड़ के...
बस यही है मलाल आँखों में ;

अब तो घर लौट कर चले आओ...
आ न जाए उबाल आँखों में ;

उम्र भर की न हो पशेमानी...
प्यार कर लो बहाल आँखों में ;

राज़े दिल खोलती हैं ये ‘तरुणा’...
है ये कैसा कमाल आँखों में...!!


बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

सारे मौसम बदल गए शायद - अलीना इतरत

सारे मौसम बदल गए शायद 
और हम भी सँभल गए शायद 

झील को कर के माहताब सुपुर्द
अक्स पा कर बहल गए शायद

एक ठहराव आ गया कैसा 
ज़ाविए ही बदल गए शायद

अपनी लौ में तपा के हम ख़ुद को 
मोम बन कर पिघल गए शायद

काँपती लौ क़रार पाने लगी 
झोंके आ कर निकल गए शायद 

हम हवा से बचा रहे थे जिन्हें 
उन चराग़ों से जल गए शायद 

अब के बरसात में भी दिल ख़ुश है 
हिज्र के ख़ौफ़ टल गए शायद 

साफ़ होने लगे सभी मंज़र 
अश्क आँखों से ढल गए शायद 

बारिश-ए-संग जैसे बारिश-ए-गुल 
सारे पत्थर पिघल गए शायद

वो 'अलीना' बदल गया था बहुत 
इस लिए हम सँभल गए शायद 


  

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

जबे बेटी फुदुकते आ.. सटावे गाल से गाले .....सौरभ

भोजपुरी में लिखी गई एक ग़ज़ल
फलनवा बन गइल मुखिया रङाइल गोड़ माथा ले   
बनल खेला बिगाड़े के.. चिलनवा ठाढ़ लाठा ले   

बड़ा अउलाह झामा-झम भइल बरखा सनूखी में  
दलानी से चुल्हानी ले अशरफी लूटु छाता ले !    

सियासत के बगइचा में तनी मवका भेंटाए तऽ  
जे बकरी पात पऽ निखुराह.. ऊहे गाँछ ले खाले    

भले कतनो पड़ऽ गोड़े निहुरि करि दऽ कमानी देहि   
नजर में तूँ अगर नइखऽ गुनाहे बा रहल पाले    

फजीरे रोज ऊ आसा-भरोसा में निकल जाला  
किरिन डूबत पलट जाला पिराते देहि-माथा ले   

चलन आखिर भला काहें रहल संसार के, कहियो -   
बथाने नेह पोसल गाय पगहा तूरि चल जाले   

बुझा जाला तुरंते भाव ’सौरभ’ बाप के का हऽ     
जबे बेटी फुदुकते आ.. सटावे गाल से गाले   
-सौरभ
भोजपुरी शब्दों के अर्थ हिन्दी में....
फलनवा - कोई ; रङाइल - रंगा हुआ ; गोड़ - पैर,  
चिलनवा - कोई, (संदर्भ-फलाना-चिलाना) ; ठाढ़ - खड़ा ; 
लाठा - बड़ी लाठी, अउलाह - अधिक ; सनूखी - सन्दुक 
दलानी - दालान, चुल्हानी - रसोईघर, बगइचा - बाग़ीचा ; 
निखुराह - आनाकानी करने वाला ; गाँछ - पेड़
निहुरि - झुक कर ; देहि - देह, नइखऽ - नहीं हो ; 
गुनाहे बा - ग़ुनाह ही है, फ़जीरे - सुबह , किरिन डूबत - साँझ होते ; पिराते - बुरी तरह पीड़ा में, काहें - क्यों ; रहल - रहा है/रही है ; कहियो - कभी, बथाने - गाय आदि का स्थान ; पोसल - पाली हुई ; पगहा - डोर ; बुझा जाला - मालूम हो जाता है, फुदुकते - उछलती-किलकती ; सटावे - सटाती है ; गाले - गाल को

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

कौन हो तुम ?........नीतू ठाकुर


मेरे अंतर मन का दर्पण या मेरी परछाई हो,
कौन हो तुम जो इस दुनिया में मेरी खातिर आई हो ?

चंद्र सी आभा मुख मंडल पर,जुल्फ घटा सी छाई है,
चन्द्रबदन,मृगनयनी हो तुम तन पर चिर तरुणाई है,
चाल चपल चंचला के जैसी, स्वर में तेरे गहराई है,
तुमने मुझको जनम दिया है, या तू मेरी जाई है ?    

मेरे अंतर मन का दर्पण या मेरी परछाई हो,
कौन हो तुम जो इस दुनिया में मेरी खातिर आई हो ?  

कभी हंसाती,कभी रुलाती कभी रोष दर्शाती हो,
कौन हो तुम जो मन की बातें बस मुझको बतलाती हो ?
मेरी कविता,मेरी रचना तू मेरा संसार है,
तूने मेरा चयन किया है ये तेरा उपकार है,
  
मेरे अंतर मन का दर्पण या मेरी परछाई हो,
कौन हो तुम जो इस दुनिया में मेरी खातिर आई हो ?  

- नीतू ठाकुर 

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

हाँ, मैं तुम्हें महसूस कर सकती हूँ....श्वेता सिन्हा

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पल पल तुझमें खो जीकर
बूँद बूँद तुम्हें हृदय से पीकर
एहसास तुम्हारा अंजुरी में भर
अनकही तुम्हारी पीड़ा को छूकर
इन अदृश्य हवाओं में घुले
तुम्हारें श्वासों के मध्यम स्पंदन को
महसूस कर सकती हूँ।

निर्विकार , निर्निमेष कृत्रिम
आवरण में लिपटकर हंसते
कागज के पुष्प सदृश चमकीले
हिमशिला का कवच पहन
अन्तर्मन के ताप से पिघल
भीतर ही भीतर दरकते
पनीले आसमान सदृश बोझिल
तुम्हारी गीली मुस्कान को
महसूस कर सकती हूँ।

कर्म की तन्मयता में रत दिन रात
इच्छाओं के भँवर में उलझे मन
यंत्रचालित तन पे ओढ़कर कर
एक परत गाढ़ी तृप्ति का लबादा,
अपनों की सुख के साज पर
रुंधे गीतों के टूटते तार बाँधकर,
कर्णप्रिय रागों को सुनाकर
मिथ्या में झूमते उदासी को तुम्हारी
महसूस कर सकती हूँ।
हाँ, मैं तुम्हें महसूस कर सकती हूँ
       -श्वेता सिन्हा

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

बरसात में बरसेगी शराब...सुदर्शन फाक़िर

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कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया

हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया

दिल तो रोता रहे ओर आँख से आँसू न बहे
इश्क़ की ऐसी रिवायात ने दिल तोड़ दिया

वो मिरे हैं मुझे मिल जाएँगे आ जाएँगे
ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया

आप को प्यार है मुझ से कि नहीं है मुझ से
जाने क्यूँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया

- सुदर्शन फाक़िर

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....नीतू ठाकुर


ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....  

आज आँखों से बरसे जो आंसू तेरे,
दर्द दुनिया में सब को दिखाने लगे,
दर्द की इन्तेहाँ तुमने देखी कहाँ,
जो अभी से सभी को सुनाने लगे, 

 ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

तुम  जफायें करो हम वफायें करे,
जेब देता नहीं है सनम प्यार में,
उम्र भर राह हम तेरी तकते रहे,
जान लेलोगे तुम प्यार ही प्यार में,

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

हमने तुमको भुलाने की कोशिश जो की,
नींद अपनी सनम क्यों उड़ाने लगे,
भूल जाते हो अपनी खताओं को क्यों,
जो खतायें हमारी गिनाने लगे,

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

चैन लूटा मेरा, ख्वाब लुटे मेरे,
लूट कर हमसे नजरे चुराने लगे,
हमने नजरे हटाई जो तुमसे सनम,
बेवफाई की तोहमत लगाने लगे, 

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

आनंद की आभा होती है .....अटलबिहारी वाजपेयी


जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई  में  भी  मेले  हों,
आनंद की आभा होती है 
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है 
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव  के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति  की  आभा होती  है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है .। 
-अटलबिहारी वाजपेयी

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

दीपावली। ...... खुशियों का त्यौहार ......" नीतू ठाकुर "




सुख शांति का वास रहे और वृद्धि हो खुशहाली में, जो चाहो वो सब मिल जाये अबके बरस दिवाली में, यदि मिट्टी के कुछ दीपक हम अबके बरस जलायेंगे, तो किसी गरीब की कुटिया में खुशियों के फूल खिलाएंगे, अथक परिश्रम करते है जो ठंडी,गर्मी,पानी में, कहीं ना टूटे उनके सपने हम सब की नादानी में, कितने सपने,कितनी आशा एक दीपक में बस जाती है, उम्मीद का सूरज उगता है जब भी दिवाली आती है, धन दौलत है पास तुम्हारे,उनकी झोली खली है, भूल ना जाना भाई मेरे उनके घर भी दिवाली है, पकवानों की चाह नहीं पर पूड़ी तो हो थाली में, अपना भी सहयोग हो शामिल उन सब की खुशहाली में, - नीतू ठाकुर

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

दीपावली.... श्वेता सिन्हा

इतराई निशा पहनकर 
झिलमिल दीपक हार
आया है जगमग जगमग
यह दीपों का त्योहार

रंगोली सतरंग सुवासित
बने गेंदा चमेली बंदनवार
किलके बालवृंद घर आँगन
महकी खुशियाँ अपरम्पार

मिट जाये तम जीवन से
लक्ष्मी माँ दे दो वरदान
हर लूँ निर्धनता हर घर से
हर होंठ खिले मुस्कान

भर भरकर मुट्ठी तारों से 
भरना है बाड़ी बस्ती में
दिन का सूरज भी न पहुँचे
निकले चाँद भी कश्ती में

इस दीवाली बन जाऊँ दीया
फैलूँ प्रकाश बन सपनों की
विहसे मुख मलिन जब किलके
मैं साक्षी बनूँ उन अपनों की

   #श्वेता

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!.........महादेवी वर्मा

1907-1987
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!

जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक
जलमय सागर का उर जलता;
विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम
वसुधा के जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल;
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!

मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर।
मैं अंचल की ओट किये हूँ!
अपनी मृदु पलकों से चंचल
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन
मैं दृग के अक्षय कोषों से-
तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

तुम असीम तेरा प्रकाश चिर
खेलेंगे नव खेल निरन्तर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा
अमिट चित्र अंकित करता चल,
सरल-सरल मेरे दीपक जल!

तू जल-जल जितना होता क्षय;
यह समीप आता छलनामय;
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
-महादेवी वर्मा

लफ्ज बिखरे है ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

मसि बहती  हिय पन्नॊं पर  कहीँ कम  कहीँ ज्यादा ! पन्ना गीला  गीला सा है  कहीँ कम  कहीँ ज्यादा ! मन भी तन्हा दुखा उम्र भर  कहीँ ...