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शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....नीतू ठाकुर


ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....  

आज आँखों से बरसे जो आंसू तेरे,
दर्द दुनिया में सब को दिखाने लगे,
दर्द की इन्तेहाँ तुमने देखी कहाँ,
जो अभी से सभी को सुनाने लगे, 

 ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

तुम  जफायें करो हम वफायें करे,
जेब देता नहीं है सनम प्यार में,
उम्र भर राह हम तेरी तकते रहे,
जान लेलोगे तुम प्यार ही प्यार में,

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

हमने तुमको भुलाने की कोशिश जो की,
नींद अपनी सनम क्यों उड़ाने लगे,
भूल जाते हो अपनी खताओं को क्यों,
जो खतायें हमारी गिनाने लगे,

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

चैन लूटा मेरा, ख्वाब लुटे मेरे,
लूट कर हमसे नजरे चुराने लगे,
हमने नजरे हटाई जो तुमसे सनम,
बेवफाई की तोहमत लगाने लगे, 

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

आनंद की आभा होती है .....अटलबिहारी वाजपेयी


जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई  में  भी  मेले  हों,
आनंद की आभा होती है 
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है 
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव  के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति  की  आभा होती  है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है .। 
-अटलबिहारी वाजपेयी

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

दीपावली। ...... खुशियों का त्यौहार ......" नीतू ठाकुर "




सुख शांति का वास रहे और वृद्धि हो खुशहाली में, जो चाहो वो सब मिल जाये अबके बरस दिवाली में, यदि मिट्टी के कुछ दीपक हम अबके बरस जलायेंगे, तो किसी गरीब की कुटिया में खुशियों के फूल खिलाएंगे, अथक परिश्रम करते है जो ठंडी,गर्मी,पानी में, कहीं ना टूटे उनके सपने हम सब की नादानी में, कितने सपने,कितनी आशा एक दीपक में बस जाती है, उम्मीद का सूरज उगता है जब भी दिवाली आती है, धन दौलत है पास तुम्हारे,उनकी झोली खली है, भूल ना जाना भाई मेरे उनके घर भी दिवाली है, पकवानों की चाह नहीं पर पूड़ी तो हो थाली में, अपना भी सहयोग हो शामिल उन सब की खुशहाली में, - नीतू ठाकुर

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

दीपावली.... श्वेता सिन्हा

इतराई निशा पहनकर 
झिलमिल दीपक हार
आया है जगमग जगमग
यह दीपों का त्योहार

रंगोली सतरंग सुवासित
बने गेंदा चमेली बंदनवार
किलके बालवृंद घर आँगन
महकी खुशियाँ अपरम्पार

मिट जाये तम जीवन से
लक्ष्मी माँ दे दो वरदान
हर लूँ निर्धनता हर घर से
हर होंठ खिले मुस्कान

भर भरकर मुट्ठी तारों से 
भरना है बाड़ी बस्ती में
दिन का सूरज भी न पहुँचे
निकले चाँद भी कश्ती में

इस दीवाली बन जाऊँ दीया
फैलूँ प्रकाश बन सपनों की
विहसे मुख मलिन जब किलके
मैं साक्षी बनूँ उन अपनों की

   #श्वेता

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!.........महादेवी वर्मा

1907-1987
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!

जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक
जलमय सागर का उर जलता;
विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम
वसुधा के जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल;
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!

मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर।
मैं अंचल की ओट किये हूँ!
अपनी मृदु पलकों से चंचल
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन
मैं दृग के अक्षय कोषों से-
तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

तुम असीम तेरा प्रकाश चिर
खेलेंगे नव खेल निरन्तर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा
अमिट चित्र अंकित करता चल,
सरल-सरल मेरे दीपक जल!

तू जल-जल जितना होता क्षय;
यह समीप आता छलनामय;
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
-महादेवी वर्मा

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

ये कुदरत का है गीत......नीतू ठाकुर



सप्त सुरों की माला है ये कुदरत का है गीत,
कण कण में पाया है मैंने जीवन का संगीत,
मधुर मिलान के प्रेम गीत या विरह मन का भार ,
सप्त सुरों में बंधा हुआ है ये सारा संसार,

झरनों की खल खल हो या फिर बिजली का हो नाद ,
ढूँढोगे तो पाओगे सप्त सुरों का स्वाद ,
सांसों की धड़कन कहती है गाले मेरे गीत,
चाहे मन में अश्रु भरे हों या हो मन में प्रीत,

भवरों की गुन गुन हो या फिर कोयलिया की तान,
कान्हा की मुरली हो या फिर रामचंद्र का बाण,
राधा के पायल की रुनझुन कहती है हर बार,
कान्हा तेरे मुरली की धुन छेड़े है दिल के तार,

मधुशाला में बजते प्याले या फिर घोड़े की नाल,
चक्कों की आवाज़ सुनो या समय चक्र की चाल,
वीणा की धुन मधुर सुहावन या तबले की थाप,
जहाँ भी ढूँढ़ो वहीँ मिलेगा भाँप सको तो भाँप ,

पतझड़ में पत्ते कहते है भूल ना जाना मीत,
नई कोपलें लायेंगी नव जीवन का संगीत,
पशु,पक्षी,या कीट,पतंगें कौन अछूता जो ना माने ,
सुन सकता है हर कोई जो भी इस अंतर मन को जाने,
-नीतू ठाकुर

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

सूरज डूबा दरिया में.......श्वेता सिन्हा

सूरज डूबा दरिया में हो गयी स्याह साँवलाई शाम।
मौन का घूँघट ओढ़े बैठी, दुल्हन-सी शरमाई शाम।।


थके पाँव पंछी भी लौटे,दीप सपन के आँख जले
बिटिया पूछे बाबा को,क्या झोली में भर लाई शाम।


छोड़ पुराने नये ख़्वाब  नयना भरने को आतुर  हैं,
पौंछ के काजल चाँदनी डाले थोड़ी-सी पगलाई शाम।


चुप है चंदा,चुप हैं तारे, वन के सारे पेड़ भी चुप हैं,
अंधेरे की ओढ़ चदरिया, लगता है पथराई शाम।


भर आँचल में जुगनू तारे बाँट दूँ मैं अंधेरों को 
भरूँ उजाला कण कण में,सोच-सोच मुस्काई शाम।


             #श्वेता🍁

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

नाजुक सी मोहब्बत है.... मनोज सिंह”मन”

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नाजुक सी मोहब्बत है, दुश्मन ज़माना है,
ये जन्मों का रिश्ता है, पर सबसे छुपाना है,

क्या तेरी मज़बूरी है, क्यों तुम्हें जाना है,
ये शीशे सा दिल है, पल में बिखर जाना है,

यंहा दीवानों का बस, मैखाना में ठिकाना है,
खुमार मोहब्बत का, सबका उतर जाना है,

अभी सबके ओठों पे, एक हसीं तराना है,
फिर गीत जुदाई के, यंहा सबको गाना है,

बेजां हुआ है दिल, कातिल वो पहचाना है,
बिंदास शमा से, परवाने को जल जाना है,

क्यों दस्तूर मोहब्बत का, ये बहुत पुराना है,
आँखों के पानी को, अश्कों में बदल जाना है,

- मनोज सिंह”मन”


गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

पल दो पल में......श्वेता सिन्हा


पल दो पल में ही ज़िदगी बदल जाती है।
खुशी हथेली पे रखी बर्फ़ सी पिघल जाती है।।

उम्र वक़्त की किताब थामे प्रश्न पूछती है,
ज़ख्म चुनते ये उम्र कैसे निकल जाती है।

दबी कोई चिंगारी होगी राख़ हुई याद में,
तन्हाई के शरारे में बेचैनियाँ मचल जाती है।

सुबह जिन्हें साथ लिये उगती है पहलू में,
उनकी राह तकते हर शाम ढल जाती है।

ख़्वाहिश लबों पर खिलती है हँसी बनकर,
आँसू बन उम्मीद पलकों से फिसल जाती है।

    श्वेता🍁

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

मुझसे ऐसी उम्मीदे रखते है....जॉन एलिया

मत पूछो कितना गमगीं हूँ गंगा जी और जमुना जी
ज्यादा मैं तुमको याद नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अपने किनारों से कह दीजो आंसू तुमको रोते है
अब मैं अपना सोग-नशीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

मैं जो बगुला बन कर बिखरा वक्त की पागल आंधी में
ज्यादा मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अब तो यहाँ के मौसम मुझसे ऐसी उम्मीदे रखते है
जैसे हमेशा से मै यही हूँ गंगा जी और जमुना जी

अमरोहे में बान नदी के पास जो लड़का रहता था 
अब वो कहाँ है? मै तो वही हूँ गंगा जी और जमुना जी 
- जॉन एलिया

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

दिन आजकल धूप से......श्वेता सिन्हा


दिन आजकल धूप से परेशान मिलती है,
साँवली शाम ऊँघती बहुत हैरान मिलती है।

रात के दामन पर सलवटें कम ही पड़ती है ,
टोहती चाँदनी से अजनबी पहचान मिलती है।

स्याह आसमां पर सितारे नज़्म बुनते है जब,
चाँद की वादियों में तहरीरें बेजुब़ान मिलती है।

दिल भटकता है जब ख़्वाहिशों के जंगल  में,
फुनगी पर ख़ाली हसरतों की दुकान मिलती है।

अधजले चाँद के टुकड़े से लिपटे अनमने बादल,
भरी यादों की गलियाँ दर्द से वीरान मिलती है।


           #श्वेता🍁

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

व्यग्र आशायें....आनंद कुमार राय

आशायें मेरी आँखों में हैं
आज शिशु -सी उमड़ रही,
अभी-अभी पग दो ही चले 
और व्यग्र-व्यथित-सी घुमड़ रही।

अनजाना, अनजानी राह पे 
समझ भरा मेरा काम न था, 
ख़ैर, चलो मैं इस जीवन से 
जो हासिल कर पाया हूँ,  
है अभिमान जो कुछ करता मैं 
सब उस की आँखों में हैं 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।

अभी उठाया है पग मैंने 
चलने की शुरुआत की है,  
तम में घिरा हुआ था कल तक
दिन में नया प्रभात किया है।
सम मेरे गम की आंधी में 
कई जीवन है उजाड़ रही ,  
पर आशायें मेरी आँखों में 
आज शिशु-सा उमड़ रहा हूँ ।
-आनंद कुमार राय

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

इस नदी की धार से.....दुष्यंत कुमार



इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

-दुष्यंत कुमार

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

तेरा साथ प्रिय....श्वेता सिन्हा

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जीवन सिंधु की स्वाति बूँद
तुम चिरजीवी मैं क्षणभंगुर,
इस देह से परे मन बंधन में
मादक कुसुमित तेरा साथ प्रिय।

पल पल स्पंदित सम्मोहन
दृग छू ले तो होती सिहरन,
विह्वल उर की व्याकुलता
अंतस तृप्ति तेरा साथ प्रिय।

अव्यक्त व्यक्त भावों का गीत
विस्मृत स्वप्नों के तुम मनमीत,
कंटक से भरे जीवन पथ पर
मृदु मोरपंखी तेरा साथ प्रिय।

स्वर्ण मृग जग छलती माया में
क्षण क्षण मिटती इस काया में,
निशि कानन के विस्तृत अंचल 
रवि किरणों सा तेरा साथ प्रिय।

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

सब्र से अब रहा नहीं जाता....विनीता तिवारी


बेबसी इस क़दर हुई बेबस
अश्क़ बनकर बहा नहीं जाता

हमने माँगा ही क्या, जो दे ना सके
सब्र से अब रहा नहीं जाता

उनकी ऊँची बहुत दुकान सही
पीर मौला कहा नहीं जाता

फ़र्क़ दिल में रहा, दिमाग में भी
उम्र का फ़ासला नहीं जाता

जा रहे चाँद पे, सितारों पे
दिल से दिल तक चला नहीं जाता

- विनीता तिवारी 

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

बरसी चाँदनी........श्वेता सिन्हा



रिमझिम-रिमझिम बरसी चाँदनी,
तन-मन,रून-झुन, बजे रागिनी।
नील नभ पटल श्वेत नीलोफर,
किरण जड़ित है शारद हासिनी।

परिमल श्यामल कुंतल बादल,
मध्य विहसे मृदु केसरी चंदा।
रजत तड़ाग से झरते मोती, 
पी लो नयन भर मदिर रस चंदा।

जमना तट कंदब के झुरमुट,
नेह बरसे मधु अंजुरी भर भर।
सुधबुध बिसराये केशव-राधा,
खेले रास मनमोहन लीलाधर।

बोझिल नयन नभ जग स्वप्निल,
एकटुक ताके निमग्न हो चातक।
चूमे सरित,तड़ाग,झील नीर लब,
ओस बन अटके पुष्प अधर तक।

चाँदी थाल क्षीर भरी दृग मोहित,
दमदम दमके नभ करतल में।
पूर्ण हो हर कामना हिय इच्छित, 
अमृत सुधा बरसे धरा आँचल में।

    #श्वेता🍁

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

तेज़ होती हुई साँसें उसकी................ परवीन शाकिर

चेहरा मेरा था निगाहें उसकी 
खामोशी में भी वो बातें उसकी

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गई
शेर कहती हुई आँखें उसकी 

शोख लम्हों का पता देने लगी 
तेज़ होती हुई साँसें उसकी 

ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने 
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी 

ध्यान में उसके ये आलम था कभी 
आँख महताब की यादें उसकी
24 नवम्बर 1952 - 26 दिसम्बर 1994
-परवीन शाकिर


मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

नज़र चुराना अच्छा है....प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

कभी-कभी जब दुनिया भर के,
नियम अनोखे हो जाते हैं।
तब उन सब रस्मों-नियमों को,
तोड़ भुलाना अच्छा है॥

जब अपना अतीत याद कर,
नज़रें हल्की झुक जाती हैं।
तब-तब अपने वर्तमान से,
नज़र मिलाना अच्छा है॥

ख़्वाबों की दुनिया में बस,
अब तेरी बातें होती हैं।
शायद तुझसे ख़्वाबों में ही,
सब कह जाना अच्छा है॥

तू जहाँ-जहाँ भी जाती है,
अपनी ख़ुशबू दे जाती है।
तेरा मुझसे मिलकर, मुझको
भी महकाना अच्छा है॥

यादों से तेरी बचते-छुपते,
मेरे दिन ढलते हैं।
निशा में आ तेरा मुझ पर,
कब्ज़ा कर जाना अच्छा है॥

दुनिया के सम्मुख अपना दु:ख,
कहने से डर लगता है।
ना समझे कोई इस खातिर,
बात बनाना अच्छा है॥

‘भोर’ देख कर बीते दिन की,
बात भुलाना अच्छा है।
कुछ लम्हों को देख के यूँ ही,
नज़र चुराना अच्छा है॥
©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

तन्हाई में बिखरी....श्वेता सिन्हा


तन्हाई में बिखरी खुशबू-ए-हिना तेरी है।
वीरान खामोशियों से आती सदा तेरी है।।

अश्क के कतरों से भरता गया दामन मेरा।
फिर भी खुशियों की माँग रहे दुआ तेरी है।।

अच्छा बहाना बनाया हमसे दूर जाने का।
टूट गये हम यूँ ही या काँच सी वफा तेरी है।।

सुकून बेचकर ग़म खरीद लाये है तुमसे।
लगाया था बाज़ार इश्क का ख़ता तेरी है।।

वक्त की शाख से टूट रहे है यादों के पत्ते।
मौसम ख़िज़ाँ नहीं बेरूखी की हवा तेरी है।।

      #श्वेता🍁

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

आशना...अमित जैन ‘मौलिक’



जबसे उनसे हुई मेरी अनबन 
तबसे सूना है शाख-ए-नशेमन।

कैसे कह दूँ के आ मेरे ज़ानिब
बेमज़ा हो गया हुँ मैं जानम।

जो महक ना बिखेरे फ़िज़ा में
क्यों सजाये कोई ऐसा गुलशन।

यूँ है आराइश-ए-आशियाना
जैसे उलझा हो कांटों से दामन।

फ़ासिला कुछ ज़हद ने बढ़ाया 
बेख़ता था सदा से ये मुल्ज़िम।

इश्क़ है ये मुहिम न बनाओ
कुछ भरम भी रहे मेरा कायम।

हसरते आशना कुछ नही है
आँख जबसे हुई मेरी पुर नम।

क्या तकाज़ा करूँ क्या तनाज़ा
इश्क़ वाले न करते तसादुम।

वो ही मुंसिब उन्हीं की अदलिया
या ख़ुदा मैं हूँ आसिम वो बरहम।

मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....नीतू ठाकुर

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए, मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....   आज आँखों से बरसे जो आंसू तेरे, दर्द दुनिया में सब को दिखा...