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मंगलवार, 20 मार्च 2018

.लोग सच कहते हैं.....ज्योत्सना मिश्रा




लोग सच कहते हैं -
औरतें बेहद अजीब होतीं है

रात भर पूरा सोती नहीं
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं है
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो कर
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं है
दरवाजों की कुंडियाॅ
बच्चों की चादर
पति का मन..
और जब जागती हैं सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं है

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

हवा की तरह घूमतीं, कभी घर में, कभी बाहर...
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती आशाऐं

पुराने अजीब से गाने गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद से दूर हो कर भी
सब के करीब होतीं हैं

औरतें सच में, बेहद अजीब होतीं हैं

कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध...

कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे, पेन्सिल, किताब
बचपन में खोई गुडिया,
जवानी में खोए पलाश,

मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी,
छिपन-छिपाई के ठिकाने
वो छोटी बहन छिप के कहीं रोती...

सहेलियों से लिए-दिये..
या चुकाए गए हिसाब
बच्चों के मोजे, पेन्सिल किताब

खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो?
सो गयी क्या ?
खाती रहती झिङकियाँ

न शौक से जीती है ,
न ठीक से मरती है
सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

कितनी बार देखी है...
मेकअप लगाये,
चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी,
वो ब्यूटीशियन,
वो भाभी, वो दीदी...

चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिख ही जाती है
कॉरीडोर में, जल्दी जल्दी चलती,
नाखूनों से सूखा आटा झाडते,

सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल मे आई वो लेडी डॉक्टर
दिन अक्सर गुजरता है शहादत में
रात फिर से सलीब होती है...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में
तितलियां संजोतीं हैं

और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फिजाएं सचमुच खिलखिलातीं हैं

तो ये सूखे कपड़ों, अचार, पापड़
बच्चों और सारी दुनिया को
भीगने से बचाने को दौड़ जातीं हैं...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं है
अनगिनत खाईयों को
अनगिनत पुलो से पाट देतीं है.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों, जंगलों में
नदी की तरह बहती...
कोंपल की तरह फूटती...

जिन्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या?
ऐसा कोई करता है क्या?

सच मे, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं..
-ज्योत्सना मिश्रा
वैचारिकी  संकलन
प्रस्तुतिः नीतू ठाकुर, 

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

मैं तुझे पहचानता हूँ....काशी नाथ त्रिपाठी


इक तरफ गुंजान बस्ती इक तरफ सुनसान बन
देखिए जब तक जहाँ लग जाय दीवाने का मन

जो न तुझको जानता हो जा के धोखा उसको दे
मैं तुझे पहचानता हूँ , जिन्दगी मुझसे न बन

चंद आँसू , काँटे, चंद कलियाँ, चंद फूल
हों सलीके से जहाँ मौजूद, वो भी इक चमन

देर तक उठता धुआँ, उठ उठ के सर धुनता रहा
सब के सब चौंके अँधेरी हो चुकी जब अंजुमन

तुम जिसे समझे हो बालों की सफेदी मेरे यार
मैं समझता हूँ उसे अपनी जवानी का कफन
-काशी नाथ त्रिपाठी
प्रस्तुतिः नीतू ठाकुर, 


रविवार, 31 दिसंबर 2017

एक भिखारी दुखियारा....प्रस्तुतिः नीतू ठाकुर


एक भिखारी दुखियारा
भूखा, प्यासा
भीख मांगता
फिरता मारा-मारा!

'अबे काम क्यों नहीं करता?'
'हट......हट!!'
कोई चिल्लाता,
कोई मन भर की सीख दे जाता।
पर.....पर....
भिखारी भीख कहीं ना पाता!

भिखारी मंदिर के बाहर गया
भक्तों को 'राम-राम' बुलाया
किसी ने एक पैसा ना थमाया
भगवन भी काम ना आया!

मस्जिद पहुँचा
आने-जाने वालों को दुआ-सलाम बजाया
किसी ने कौडी ना दी
मुसीबत में अल्लाह भी पार ना लाया!

भिखारी बदहवास
कोई ना बची आस
जान लेवा हो गई भूख-प्यास।
जाते-जाते ये भी आजमा लूँ
गुरूद्वारे भी शीश नवा लूं!
'सरदार जी, भूखा-प्यासा हूं।।।
'ओए मेरा कसूर अ?'
भिखारी को लगा किस्मत बडी दूर है। 

आगे बढा़....
तभी एक देसी ठेके से बाहर निकलता शराबी नजर आया
भिखारी ने फिर अपना अलाप दोहराया।। 
'बाबू भूखे को खाना मिल जाए
तेरी जोडी बनी रहे, तू ऊँचा रूतबा पाए।'

'अरे भाई क्या चाहिए'
'बाबू दो रूपया ---
भूखे पेट का सवाल है!'
शराबी जेब में हाथ डाल बुदबुदाया।।।
'अरे, तू तो बडा बेहाल है!'
'बाबू दो रूपये......'
'अरे दो क्या सौ ले।'
'बाबू बस खाने को......दो ही.....दो ही काफ़ी है।'
'अरे ले पकड सौ ले...
पेट भर के खाले......
बच जाए तो ठररे की चुस्की लगा ले।।।'

हाथ पे सौ का नोट धर शराबी आगे बढ ग़या।

भिखारी को मानो अल्लाह मिल गया।

'तेरी जोडी बनी रहे, तू ऊँचा रूतबा पाए!'
भिखारी धीरे से घर की राह पकडता है।
रस्ते में फिर मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारा पड़ता है।

भिखारी धीरे से बुदबुदाता है.......
'वाह रे भगवन्.......
तू भी खूब लीला रचाता है
मांगने वालों से बचता फिरता, इधर-उधर छिप जाता है
रहता कहीं हैं
बताता कहीं है
आज अगर ठेके न जाता
खुदाया, मैं तो भूखों ही मर जाता!
इधर-उधर भटकता रहता
तेरा सही पता भी न पाता
तेरा सही पता भी न पाता!
तेरा सही पता भी न पाता!!

- रोहित कुमार 'हैप्पी'
प्रस्तुतिः नीतू ठाकुर

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

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