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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

पूछ रहे है वो हमसे .......डॉ. इन्दिरा गुप्ता

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पूछ रहे है वो हमसे 
रवायते - ए - मौहब्बत क्या होगी 
हमने लब खमोश रखे 
देखै उनकी इनायत क्या होगी ! 

दस्तुरे वफा वो पूछ रहे 
तो इश्केदारी क्या होगी 
बहुत हुआ कहना सुनना 
उनसे दुनियॉ दारी ही होगी ! 

बज़्म भी है और तुम भी है 
और हम भी है खामोश सनम 
शोर भरी इस महफिल मै 
फिर इश्क की कीमत क्या होगी ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

नेह / ज्ञान .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


भौंचक रहा गये ज्ञानी ऊधौ 
बुद्धि लगी चकराने 
भोली ग्वालिन अनपढ़ जाहिल 
कैसो ज्ञान बखाने ! 

एक तमक कर बोली ग्वालिन 
क्या आये हो लेने 
मूल धन अक्रूर ले गये 
तुम क्या आये ब्याज के लाने ! 

कुब्जा के कहे आये हो तो 
इतनी बात समझ लो 
दूध दही मै फर्क ना जाने 
वाकी बातन पर का जानो ! 

हमरो मारग नेह को 
फूलन की सी क्यारी 
निर्गुण  कंटक बोय के 
काहे बर्बाद कर रहे यारी ! 

तुम तो ज्ञानी ध्यानी ऊधौ 
एक बात कहो साँची 
कहीँ सुनी नारी जोग लियो है 
का वेद पुराण ना बाँची ! 

जाओ अब और ना रुकना 
बात बिगड़ जायेगी 
कान्हा पे रिस आय रही है 
तुम पे उतर जायेगी ! 

एक तो इति दूर बैठे है 
ऊपर से ज्ञान बघारे 
निर्गुण -सगुण को भेद बतरावे
का हमें बावरी जाने ! 

नेह -ज्ञान से एक चुननो थो 
नेह भाव  चुन लीनो 
बीते उमरिया अब चाहे जैसी 
अब नहीँ पालो बदलनौ ! 

कहना जाके श्याम को 
तनि चिंतित ना  होय 
आनौ हो तो खुद ही आये 
और ना भेजे कोय ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

एक तो महकी फिजा है ......डॉ. इन्दिरा गुप्ता

रफ्ता -रफ्ता, बेलौस मेरी 
रूहें कलम लिखने लगी 
हम नशीनो नज़्म मेरी 
यकसां गुनगुनाने भी लगी ! 

छू गई चेहरे को मेरी 
बज़्म की संदल हवा 
बिन लिखे अल्फाज़ मेरे 
मुझको सुनाने सी लगी ! 

राहते -तलब है कोई 
या इश्किया बीमार है 
बेवजह रुखसार पे 
रूनाइयाँ छाने लगी ! 

एक तो महकी फिजा है 
उस पर तरन्नुम सा खयाल 
छन्न से कुछ यादें खनक के 
तन्हाई सजाने सी लगी ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

लफ्ज बिखरे है ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


मसि बहती 
हिय पन्नॊं पर 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !
पन्ना गीला 
गीला सा है 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !
मन भी तन्हा
दुखा उम्र भर 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !
सन्नाटा सा 
पसरा है 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !
बेचैन लकीरें 
कहती है 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !
जाने कितने 
मौसम आये 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !
अब के भी 
सावन सरसाये 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा 
जाने कहाँ 
लफ्ज बिखरे हैं 
कभी कम 
कभी ज्यादा!
मसि मेरी 
सूखी चट्के है 
कहीँ कम 
कहीँ ज्यादा !!

-डॉ. इन्दिरा गुप्ता

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

हम हौसलों से उड़ान भरते ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


अपना मुकाम 
पाने के खातिर 
हमने कई 
मोल चुकाये है 
रोज थोड़ी 
मारी ज़िंदगी 
तब हसरत 
पूरी कर पाये है ! 

चोटों से हम
कब घबराते 
ना जी को
भारी करते 
पैरो से कब
चलते है हम 
हम हौसलों से
उड़ान भरते ! ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

खामोश जुबाँ .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


खामोश जुबाँ 
खामोश नजर 
खामोश 
बसर खामोश ! 

खामोशी के 
मंजर का 
हर पल है 
खामोश ! 

चाँद - चाँदनी 
मौन साधक से 
शबनम भी बहती 
खमोश ! 


नील गगन से 
निशब्द धरा तक 
हर जर्रा 
खामोश !
डॉ. इन्दिरा गुप्ता

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...