फूँकने को एक..चिंगारी बहुत है !
मौत से तो..जिंदगी भारी बहुत है !!
सीख अब हमने लिया है सबक यारा..
जिंदगी मीठी कभी खारी बहुत है !!
ऐहसासों में अब...दम कहाँ खुदाई !
आज रुख हर तरफ़..बाजारी बहुत है !!
धुंध हटती क्यूँ नहीं...उस..वेहया से !
खून में..जो...आज...गद्दारी बहुत है !!
सिलसिला मिलने नहीँ देता जभी तो...
गुफ्तगू में एक लाचारी बहुत है !!
आइना तो झूठ बोला ही नहीं था !
उस दिखावे में अदाकारी बहुत है!!
शोखियाँ जर-जर हुईं हैं भारती क्यूँ ?
नोचता अब फ़कत फुलवारी बहुत है !!
-अलका गुप्ता
