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गुरुवार, 10 मई 2018

वफ़ायें तो हुई है अब.......उपेन्द्र परवाज़

वफ़ायें तो हुई है अब जिस्मों का शबाब 
दुनिया के बगीचे में, प्यार हुआ काग़ज़ का गुलाब 

दिल जो टूटा करते थे गुज़रे ज़माने की बातें है 
इस ज़माने में रोज़ इक दिल तोड़ना, भी है ख़िताब।

अब बुझी अंगड़ाइयाँ हैं अब तब्बसुम ही नहीं
रोशनी बल्बों से मिलती, गुम हुए है आफ़ताब।

पाने की जब इतनी परवाह खोने से क्यों डर रहे
ये तो साहब ज़िन्दगी है, ना किसी बनिये का हिसाब। 

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
दुनिया कहती है की इनका फ़न है, कितना लाजवाब।

आदमी अब आदमी से रोज़ मिलाता है यहाँ
दिल अब शायद किसी से मिले, अब वो ज़माना है ज़नाब।
-उपेन्द्र परवाज़

रविवार, 28 जनवरी 2018

वो शिकार देखिये.....उपेन्द्र परवाज़

उनकी निगाहों के वार देखिये
जो बच गए घायल, वो शिकार देखिये।

मेरे दिल की कोई अब कीमत कहाँ रही 
उनके दिल के, आज खरीददार देखिये।

बारिशों में खुलने लगे है अब हुस्न के भरम 
जो रंग छोड़ने लगे, वो रुख़सार देखिये।

गुज़रे जहाँ से वहाँ हुए, क्या क्या नहीं सितम
तीमारदार भी हो गये, अब बीमार देखिये।

फ़िज़ा में हुस्न का ज़हर फैला है इस कदर 
कि उतर नहीं रहे अब, इश्क के बुखार देखिये।

जब दिल की तमन्नाओ पे फिर ही गया पानी 
तो “परवाज़” मोहब्बतों के कारोबार देखिये।
-उपेन्द्र परवाज़

14...बेताल पच्चीसी....चोर क्यों रोया

चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?” अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक सा...