धूप का दम निकल गया
ये न समझो उजाला गया
पत्थरों की नुमाइश हुई
फूल क़दमों में डाला गया
शक़ तो खुद की वफ़ाओं पे था
और मिरा दिल ख़ँगाला गया
भूख को यूँ तसल्ली हुई
पत्तियों को उबाला गया
बच्चे जब चैन से सो गए
हलक़ से तब निवाला गया
चाहतों की गुज़ारिश भी थी
साँप भी घर में पाला गया
है पहाड़ों का सर भी वहीं
रास्ता भी निकाला गया
-सचिन अग्रवाल
