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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

मुझसे ऐसी उम्मीदे रखते है....जॉन एलिया

मत पूछो कितना गमगीं हूँ गंगा जी और जमुना जी
ज्यादा मैं तुमको याद नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अपने किनारों से कह दीजो आंसू तुमको रोते है
अब मैं अपना सोग-नशीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

मैं जो बगुला बन कर बिखरा वक्त की पागल आंधी में
ज्यादा मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अब तो यहाँ के मौसम मुझसे ऐसी उम्मीदे रखते है
जैसे हमेशा से मै यही हूँ गंगा जी और जमुना जी

अमरोहे में बान नदी के पास जो लड़का रहता था 
अब वो कहाँ है? मै तो वही हूँ गंगा जी और जमुना जी 
- जॉन एलिया

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !
    क्या कहने इस कलाम के।
    अमरोहा में जन्मे नामचीन पाकिस्तानी शायर जॉन एलिया बहुभाषाविद थे। उनका उर्दू , अरबी, फ़ारसी, संस्कृत और अँग्रेज़ी पर समान अधिकार था। व्यक्ति का अपनी जड़ों से जीवन भर भावनात्मक जुड़ाव बना रहता है।
    विविधा के ज़रिये सुधि पाठकों, रचनकारों को बेहतरीन पठन सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 13 अक्टूबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13-10-2017) को
    "कागज़ की नाव" (चर्चा अंक 2756)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह वाह। जॉन एलिया साहेब का तो जबाब ही नहीं। सीधी बात कहने में उनका कोई सानी नही था। उनके एक शेर का ज़िक्र करना चाहूँगा-

    जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ
    मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ।

    सुंदर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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