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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

मैं जा रहा हूँ मेरा इन्तेज़ार मत करना / अनवर जलालपुरी

मैं जा रहा हूँ मेरा इन्तेज़ार मत करना
मेरे लिये कभी भी दिल सोगवार मत करना

मेरी जुदाई तेरे दिल की आज़माइश है
इस आइने को कभी शर्मसार मत करना

फ़क़ीर बन के मिले इस अहद के रावण
मेरे ख़याल की रेखा को पार मत करना

ज़माने वाले बज़ाहिर तो सबके हैं हमदर्द
ज़माने वालों का तुम ऐतबार मत करना

ख़रीद देना खिलौने तमाम बच्चों को
तुम उन पे मेरा आश्कार मत करना

मैं एक रोज़ बहरहाल लौट आऊँगा
तुम उँगुलियों पे मगर दिन शुमार मत करना



सोमवार, 8 जनवरी 2018

पत्थरों की नुमाइश...सचिन अग्रवाल

धूप का दम निकल गया
ये न समझो उजाला गया

पत्थरों की नुमाइश हुई
फूल क़दमों में डाला गया

शक़ तो खुद की वफ़ाओं पे था
और मिरा दिल ख़ँगाला गया

भूख को यूँ तसल्ली हुई
पत्तियों को उबाला गया

बच्चे जब चैन से सो गए
हलक़ से तब निवाला गया

चाहतों की गुज़ारिश भी थी
साँप भी घर में पाला गया

है पहाड़ों का सर भी वहीं
रास्ता भी निकाला गया
-सचिन अग्रवाल

रविवार, 7 जनवरी 2018

स्त्री विमर्श पर .....नीरज द्विवेदी


स्त्री विमर्श पर 
मेरे सारे तर्क,
सारा ज्ञान,
सारा पौरूष,
चुक जाता है
शब्द टूटने लगते हैं..
मै, निरूत्तरित.. आवाक
तुम्हे देखने लगता हूँ.....
जब तुम बड़ी सहजता से पूछ लेती हो,
कि...
"मै औरत हूँं,
पर.... मै हूँ कौन ??

-नीरज द्विवेदी

शनिवार, 6 जनवरी 2018

तुम्हारे प्यार में.....अनीता लागुरी (अनु)


तुम्हारे प्यार में.....
हां तुम्हारे प्यार में डूबा मैं
उस चांद से पूछ बैठता हूँ
क्या तुम्हें नींद नहीं आती
यों  टकटकी लगाए,
क्या देखते हो
या रातों को जागने की 
आदत हो  गई
मेरी  तरह..?
या तुम भी कर बैठे प्यार किसी से?
क्या करुं
सर्दी में मुँह से निकलते धुंए को
हवाओं में उड़ाता चला हूँ मैं 
जानता हूँ मैं 
ये  धुआँ नहीं भ्रम है  मेरा
पर फिर भी इस दिल को 
समझाऊँ  कैसे
जो तुम्हारे न होने के अहसास को
पुख़्ता  सबूत बनाता है
जो मेरे  क़दमों को थाम 
आगे बढ़ने से रोक देता है
हाँ सिर्फ़  तुम्हारे प्यार में
बावरा बन.. घूम आता  हूँ
गलियों में , चौराहों पर ...
तो कभी यादों की पगडंडियों पर
थामे हाथ तुम्हारा चल पड़ता  हूँ
उस अनंत क्षितिज की ओर
उस लाल रक्तिम आभा से युक्त
सूरज को छूने
तो कभी तुम्हारी धड़कनों की
धक-धक को सुन उसकी लय में
ख़ुद  को तलाशता
अंजाने ही अर्थविहीन चल पड़ता हूँ
तो कभी छत पर सूखता 
तुम्हारा वो नीला-नारंगी दुपट्टा अलबेला
और उससे आती तुम्हारे बदन की वो ख़ुशबू ...!
उसे ढूंढ़ता  न जाने कहां चल पड़ता हूँ  मैं
हां तुम्हारे प्यार में.!
न जाने क्यों
पाबंदियां की परिभाषा भूल गया हूँ
मौसम के चढ़ने-उतरने का 
राग भूल गया हूँ
नभ में उड़ते पंछियों की आज़ादी
भूल गया हूँ मैं 
हाँ  तुम्हारे प्यार में
सुर्ख़ मख़मली एहसासों की नुमाइश कर चला हूँ
समेट लो अपने बाहों में.....
वरना ....न जाने क्या से क्या चला हूँ  मैं...!!!
-अनीता लागुरी (अनु)

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

भूखे पेट भजन होता है....रामश्याम हसीन

भूखे पेट भजन होता है
अपना अपना मन होता है 

होता कुछ है कुछ दिखलाता 
ऐसा भी दर्पण होता है 

पैसे वाले में दिल मुश्किल 
दिल बाला निर्धन होता है 

सुलझे-सुलझे जीवन में भी 
उलझा-उलझा मन होता है 

हर पारीना घर में अब भी 
सबका इक आँगन होता है
-रामश्याम हसीन

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

चंचल हिरनी सी हूँ मैं !.....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


मैं अलबेली 
रहती अकेली 
अपनी सहेली 
सी हूँ मैं ! 

लहरा कर
बल खाकर 
चलती 
विश्व सुँदरी 
सी हूँ मैं ! 

उम्र हाल ना 
मेरा देखो 
मन संतुलन
रखती 
हूँ मैं ! 

सधे हुऐ
कदमो से नित 
जल भर
कर लाती 
हूँ मैं

बोल अनसुने 
लब पर रखती 
कुंतल काँधे 
बिखेरती 
हूँ मैं ! 

मंथर गति से 
थम कर 
चलती
चंचल हिरनी
सी हूँ मैं ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

बुधवार, 3 जनवरी 2018

ढाई अक्षर.....रश्मि भटनागर


आज से सदियों पहले
शायद सृष्टि के समय
मैंने दिल की किताब से
कुछ अक्षर चुराये।
चोरी तो चोरी है - कभी पकड़ी ही जायेगी
घबराई सी मैं
उन अक्षरों को लेकर भटकती रही
फिर मैंने वो अक्षर
एक कली में छुपा दिए
अगले ही दिन
वो कली चटकी और फूल बनी
अब फिर डर लगा मुझे
सबको पता चल जायेगा
वहाँ से अक्षर उठा कर
मैंने फूल पर रख दिए
थोड़ी देर में ही वहाँ
भंवरे गुनगुनाने लगे
फिर वो अक्षर मैंने
चुपके से उठाये - और
आसमान में उछाल दिए
ये सब क्या हो गया
मैंने तो सिर्फ ढाई अक्षर ही चुराये थे
ये तो लाखों तारे बन गए
काश, मैं वो अक्षर अपने
दिल में ही रख लेती| 
-रश्मि भटनागर

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...