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मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मीरा तुझमें आन बसी है ............हबीब 'जालिब'

तेरे मधुर गीतों के सहारे 
बीते हैं दिन रैन हमारे 
तेरी अगर आवाज़ न होती 
बुझ जाती जीवन की ज्योति 
तेरे सच्चे सुर हैं ऐसे 
जैसे सूरज-चाँद-सितारे 

क्या क्या तूने गीत हैं गाये
सुर जब लागे मन झुक जाए 
तुमको सुनकर जी उठते हैं 
हम जैसे दुःख-दर्द के मारे 

मीरा तुझमें आन बसी है 
अंग वही है रंग वही है 
जग में तेरे दास हैं इतने 
जितने हैं आकाश में तारे 
तेरे मधुर गीतों के सहारे 
बीते हैं दिन रैन हमारे


सोमवार, 6 नवंबर 2017

आसान जिंदगी को मुश्किल में डालना.........पंकज सिंह

आसान जिंदगी को मुश्किल में डालना
मानो बांए हाथ का खेल है दिखाना

जले पर नमक छिड़क कर उकसाना
आग में घी डालकर और भड़काना

चिल्ला कर आसमान सिर पर उठाना
आमने-सामने लड़ने की चुनौती देना

जीती हुई बाजी हार कर शोक मनाना
चिड़ि‍या के खेत चुगने पर आंसू बहाना

दूसरे की किस्मत लिखने का फैसला करना
अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारना

जिस डाल पर बैठे उसे ही काट डालना
सोने के अंडे की चाह में मुर्गी हलाल करना

गंजे के सिर पर बाल उगाने की कोशिश करना
सरपट दौड़ती जिंदगी को पटरी से उतारना

आसान जिंदगी को मुश्किल में डालना
मानो बांए हाथ का खेल है दिखाना
-पंकज सिंह 


रविवार, 5 नवंबर 2017

तारीखें, आती हैं-जाती हैं .....देवेन्द्र सोनी


तारीखें, आती हैं-जाती हैं 
फिर-फिर आती हैं 
पर समाया रहता है इनमें
सृष्टि का, हम सबका
कहा / अनकहा 
वह हिसाब, जो 
चलता है जन्म-जन्मांतर तक।

बच नहीं सकता 
इन तारीखों से कोई ।

इसलिए जरूरी है -
रखें यह ध्यान 
हर तारीख में हो वही दर्ज
जिससे जब भी मिले 
प्रतिफल हमको, हो वह सुखद
और पछतावे से रहित।

दें जो वह सुखानुभूति 
जिसमें समाहित हो 
इंसानियत का हर रंग।

बनाएंगे न अब से हम 
हर तारीख को ऐसी ही तारीख।
-देवेन्द्र सोनी


शनिवार, 4 नवंबर 2017

रानी पदमावती.....नीतू ठाकुर

एक हाथ में विष का प्याला 
एक हाथ में धरी कटार 
आज तजेंगे प्राण मगर 
दुश्मन से ना मानेंगे हार 
क्या समझ रहे थे तुम अबला 
जो हाथों में आ जायेंगे 
हम वीर शेरनी की जाई 
हम तुमको धुल चटायेंगे 
है लाज शरम गहना माना 
घूँघट में शीश छुपाते है 
पर वक़्त पड़े तो बन काली 
राण में तलवार चलाते है 
नासमझ समझ का फेर है ये 
हम दास तेरे हो जायेंगे 
यदि वक़्त पड़ा तो अग्नि पे 
जौहर का खेल दिखायेंगे 
ये हिन्द देश की छत्राणी 
ना कदम हटायेंगी पीछे 
तू कदम बढ़ा के देख जरा 
कुचलेंगें क़दमों के निचे 
तुझ जैसे नीच नराधम को 
हम कभी शरण ना आयेंगे  
पग आज बढ़ा के देख जरा 
तुझको औकात दिखायेंगे 
राज महल की दीवारों को 
हम शमशान बनायेंगे 
धरती माँ की आन की खातिर 
अपनी चिता जलायेंगे 
शर्म लुटाके जीने से 
बेहतर होती है वीरगती 
जब तक थे तन में प्राण 
यही कह रही थी रानी पदमावती    
   -नीतू ठाकुर 
**अमर उजाला व काव्यालय
में प्रकाशित रचना







शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

चाँद आ तो गया मेरे घर में....मनी यादव

मौत को अपना आशना रक्खें
ज़िन्दगी से भी वास्ता रक्खें

चाँद आ तो गया मेरे घर में
चाँदनी इसकी हम कहाँ रक्खें

शाइरी सुनना कोई खेल नहीं
शेर पर ही मुलाहिज़ा रक्खें

प्यास दरिया बुझा नही सकता
इसलिए पास में कुआँ रक्खें

पेड़ तहज़ीब का पड़ा जख़्मी
पूर्वजों इसपे कुछ दुआ रक्खें

तू बुलंदी दिखा रहा मुझको
ज़ेब में हम तो आसमाँ रक्खें
-मनी यादव

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

वाह ... गज़ब का कलाकार ......प्रस्तुति श्वेता सिन्हा

थ्री डी आर्ट
वाह ... गज़ब का कलाकार 
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जाने किस स्याही से लिख गया दास्तां वो

मिटाये न मिटे छोड़ गया खुरदरे निशां वो

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टूट कर बिखरा एक एक ख्वाब आँखों का

सूना कर गया मेरे दिल का आबाद मकां वो
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कह नहीं पाए अपनी बेचैन रातों की कहानी
नम गिलाफ पर अश्क कर देते है दर्द बयां वो

#श्वेता🍁


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फोटो द्वारा

बुधवार, 1 नवंबर 2017

पुनः और पुनः ....यशोदा


लिखी जाती है कविता... 
किसी कवि की कलम से... 
उतरती है सियाही कागज पर..
पूरी होती जब वो कविता...
पढ़ता है कवि उसे और 
उस बदनसीब कागज को 
फेंक देता है..
बनाकर लड्डू जैसा गोल,,,,
सोचता है कुछ 
फिर उठाकर उस 
लड्डू को...
खोलकर एतिहात से...
पढ़ता है 
पुनः और पुनः ....
उतारता है उस कविता को...
कागज एक नया लेकर..
फिर लिखता है कुछ... 
चेहरे पर उसके 
मुस्कान एक 
छोटी सी आती है....
सहेज लेता है उसे..
सोचता है...
तसल्ली है उसे..
पूरी हो गई ये कविता..
नहीं है परवाह उसे...
कि क्या सोचेगा..
पढ़ने वाला उस
कविता को...उसे 
इस बात की... 
कतई नहीं है चिन्ता
क्योंकि जानता है वह 
कि यह कविता उसने
लिखी ही है... 
अपने आप के लिए..
-यशोदा

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...