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शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

प्यास लिए भटकूँ.....डॉ. डी. एम. मिश्र

रग-रग में कंटक-सी चुभती श्वास लिए भटकूँ
अपने काँधे पर मैं अपनी लाश लिए भटकूँ।

लोगों की हमदर्दी का मॅुहताज़ हो गया हूँ
सूनी-सूनी आँखों में आकाश लिए भटकूँ।

जश्न मनाओ तुम अपना मैं दर्द सहूँ अपना
सारे रिश्ते-नातों से अवकाश लिए भटकूँ।

मैंने मांगा इक छोटा–सा मीठा–सा झरना
ऐसा खारा मिला समन्दर प्यास लिए भटकूँ।
-डॉ. डी. एम. मिश्र

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