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शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

तेरा साथ प्रिय....श्वेता सिन्हा

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जीवन सिंधु की स्वाति बूँद
तुम चिरजीवी मैं क्षणभंगुर,
इस देह से परे मन बंधन में
मादक कुसुमित तेरा साथ प्रिय।

पल पल स्पंदित सम्मोहन
दृग छू ले तो होती सिहरन,
विह्वल उर की व्याकुलता
अंतस तृप्ति तेरा साथ प्रिय।

अव्यक्त व्यक्त भावों का गीत
विस्मृत स्वप्नों के तुम मनमीत,
कंटक से भरे जीवन पथ पर
मृदु मोरपंखी तेरा साथ प्रिय।

स्वर्ण मृग जग छलती माया में
क्षण क्षण मिटती इस काया में,
निशि कानन के विस्तृत अंचल 
रवि किरणों सा तेरा साथ प्रिय।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

सब्र से अब रहा नहीं जाता....विनीता तिवारी


बेबसी इस क़दर हुई बेबस
अश्क़ बनकर बहा नहीं जाता

हमने माँगा ही क्या, जो दे ना सके
सब्र से अब रहा नहीं जाता

उनकी ऊँची बहुत दुकान सही
पीर मौला कहा नहीं जाता

फ़र्क़ दिल में रहा, दिमाग में भी
उम्र का फ़ासला नहीं जाता

जा रहे चाँद पे, सितारों पे
दिल से दिल तक चला नहीं जाता

- विनीता तिवारी 

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

बरसी चाँदनी........श्वेता सिन्हा



रिमझिम-रिमझिम बरसी चाँदनी,
तन-मन,रून-झुन, बजे रागिनी।
नील नभ पटल श्वेत नीलोफर,
किरण जड़ित है शारद हासिनी।

परिमल श्यामल कुंतल बादल,
मध्य विहसे मृदु केसरी चंदा।
रजत तड़ाग से झरते मोती, 
पी लो नयन भर मदिर रस चंदा।

जमना तट कंदब के झुरमुट,
नेह बरसे मधु अंजुरी भर भर।
सुधबुध बिसराये केशव-राधा,
खेले रास मनमोहन लीलाधर।

बोझिल नयन नभ जग स्वप्निल,
एकटुक ताके निमग्न हो चातक।
चूमे सरित,तड़ाग,झील नीर लब,
ओस बन अटके पुष्प अधर तक।

चाँदी थाल क्षीर भरी दृग मोहित,
दमदम दमके नभ करतल में।
पूर्ण हो हर कामना हिय इच्छित, 
अमृत सुधा बरसे धरा आँचल में।

    #श्वेता🍁

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

तेज़ होती हुई साँसें उसकी................ परवीन शाकिर

चेहरा मेरा था निगाहें उसकी 
खामोशी में भी वो बातें उसकी

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गई
शेर कहती हुई आँखें उसकी 

शोख लम्हों का पता देने लगी 
तेज़ होती हुई साँसें उसकी 

ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने 
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी 

ध्यान में उसके ये आलम था कभी 
आँख महताब की यादें उसकी
24 नवम्बर 1952 - 26 दिसम्बर 1994
-परवीन शाकिर


मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

नज़र चुराना अच्छा है....प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

कभी-कभी जब दुनिया भर के,
नियम अनोखे हो जाते हैं।
तब उन सब रस्मों-नियमों को,
तोड़ भुलाना अच्छा है॥

जब अपना अतीत याद कर,
नज़रें हल्की झुक जाती हैं।
तब-तब अपने वर्तमान से,
नज़र मिलाना अच्छा है॥

ख़्वाबों की दुनिया में बस,
अब तेरी बातें होती हैं।
शायद तुझसे ख़्वाबों में ही,
सब कह जाना अच्छा है॥

तू जहाँ-जहाँ भी जाती है,
अपनी ख़ुशबू दे जाती है।
तेरा मुझसे मिलकर, मुझको
भी महकाना अच्छा है॥

यादों से तेरी बचते-छुपते,
मेरे दिन ढलते हैं।
निशा में आ तेरा मुझ पर,
कब्ज़ा कर जाना अच्छा है॥

दुनिया के सम्मुख अपना दु:ख,
कहने से डर लगता है।
ना समझे कोई इस खातिर,
बात बनाना अच्छा है॥

‘भोर’ देख कर बीते दिन की,
बात भुलाना अच्छा है।
कुछ लम्हों को देख के यूँ ही,
नज़र चुराना अच्छा है॥
©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

तन्हाई में बिखरी....श्वेता सिन्हा


तन्हाई में बिखरी खुशबू-ए-हिना तेरी है।
वीरान खामोशियों से आती सदा तेरी है।।

अश्क के कतरों से भरता गया दामन मेरा।
फिर भी खुशियों की माँग रहे दुआ तेरी है।।

अच्छा बहाना बनाया हमसे दूर जाने का।
टूट गये हम यूँ ही या काँच सी वफा तेरी है।।

सुकून बेचकर ग़म खरीद लाये है तुमसे।
लगाया था बाज़ार इश्क का ख़ता तेरी है।।

वक्त की शाख से टूट रहे है यादों के पत्ते।
मौसम ख़िज़ाँ नहीं बेरूखी की हवा तेरी है।।

      #श्वेता🍁

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

आशना...अमित जैन ‘मौलिक’



जबसे उनसे हुई मेरी अनबन 
तबसे सूना है शाख-ए-नशेमन।

कैसे कह दूँ के आ मेरे ज़ानिब
बेमज़ा हो गया हुँ मैं जानम।

जो महक ना बिखेरे फ़िज़ा में
क्यों सजाये कोई ऐसा गुलशन।

यूँ है आराइश-ए-आशियाना
जैसे उलझा हो कांटों से दामन।

फ़ासिला कुछ ज़हद ने बढ़ाया 
बेख़ता था सदा से ये मुल्ज़िम।

इश्क़ है ये मुहिम न बनाओ
कुछ भरम भी रहे मेरा कायम।

हसरते आशना कुछ नही है
आँख जबसे हुई मेरी पुर नम।

क्या तकाज़ा करूँ क्या तनाज़ा
इश्क़ वाले न करते तसादुम।

वो ही मुंसिब उन्हीं की अदलिया
या ख़ुदा मैं हूँ आसिम वो बरहम।

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...