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मेरा सलीका मेरे साथ
मेरा सलीका भाभी घर छोड़कर जा रही थी उसने अलमारी में अपनी जगह खाली की चाबियां मेज पर रक्खी, मां के लिए दवा रखी, दरवाजे के पास के बिखरे जूते ...
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इक अक्श हूँ, ख्यालों में ढल जाऊँगा मैं, सोचोगे जब भी तुम, सामने नजरों के आ जाऊँगा मैं... जब दरारें तन्हा लम्हों में आ जाए, वक्त के कं...
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न करना गुमान कामयाबी का चढता सूरज ढलते देखा । बुझ गया हो दीप न डरना प्रयासों से फिर जलते देखा । हीरा पड़ा रह जाता कई बार ...
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सुना -अनसुना कर हर पल गुजरता क्या किस्सा कहे उनकी बेरुखी का ! उमर का सफीना साहिल पे डूबा जमाना भी था तब दिल्लगी का ! स...

सुन्दर
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (22-01-2018) को "आरती उतार लो, आ गया बसन्त है" (चर्चा अंक-2856) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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बसन्तपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी
बहुत ही बढ़िया।
जवाब देंहटाएंमुझे लगता है, हर किसी के दिल में कभी ना कभी ऐसा ही जज़्बात छुपे होते हैं—जिन्हें दुनिया शायद समझती नहीं, पर ये शायरी उनके लिए एक आवाज़ बन जाती है। सच में, इस तरह की शायरी हमें अपने अंदर के उस भावुक हिस्से से जोड़ती हैजो पता नहीं कबसे चुपचाप बैठा रहता है।
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