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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

पूछ रहे है वो हमसे .......डॉ. इन्दिरा गुप्ता

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पूछ रहे है वो हमसे 
रवायते - ए - मौहब्बत क्या होगी 
हमने लब खमोश रखे 
देखै उनकी इनायत क्या होगी ! 

दस्तुरे वफा वो पूछ रहे 
तो इश्केदारी क्या होगी 
बहुत हुआ कहना सुनना 
उनसे दुनियॉ दारी ही होगी ! 

बज़्म भी है और तुम भी है 
और हम भी है खामोश सनम 
शोर भरी इस महफिल मै 
फिर इश्क की कीमत क्या होगी ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

पहाड़ी नदी के बारे में,,,,,सुशील कुमार


अपनी बाँहों में
कलसियाँ
होठों पर
वीरानियों से सनी
घिर आयी साँझ की
कोई विदागीत
गुनगुनाती पहाड़न
उस बूढ़ी नदी के
सीने पर
छोटी-छोटी
कटोरियाँ
बनाती है
रेत से
रेत को
अलग करके ।

क्षण में उस वृद्धा के
विलाप से
कटोरियों का तल
पसीज जाता है
और अँजुरी समाने भर
पारभासी नीर
पात्र में
थिराने लगता है
पहाड़न
उलीच-उलीच कर उसे
वियोगिनी नदी माता के
आँचल में
डाल देती है
यज्ञ के अनल-कुंड में
पूजित भाव से प्रक्षेपित
हव्य की तरह।
तब स्नेहिल
वात्सल्य का
स्वच्छ
पारदर्शी
प्रशांत जल
पात्र में
ठहरने लगता है और
पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर होने लगता है ।
पहाड़ की मिट्टी से बनी
कलसियों में
पहाड़ का दुःख
नदी का ममत्व भरकर

वरह की कोई पहाड़ी गीत
फिर गुनगुनाती,
अंधेरे होते
अपने गेहों को
लौटती पहाड़न के
पदचाप
और स्वर
तब सिर्फ़
नदी और पहाड़ ही
सुन पाते हैं
उस सुनसान दयार में।

-सुशील कुमार

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

पाहुन की मिट्टी हूं.....मुक्ता मिश्रा


तेरे पाहुन की मिट्टी हूं...
   मुझको जीवन का बोध करा
निश्छल उड़ती अनुमोदन मे
   मेरे क्रंदन का बोध मिटा
तेरे पाहुन की मिट्टी हूं..
   दो पल की यौवन बेला मे
मुझको छलिया के गीत सुना
   तेरा आर्वतन निश्चित है
मैं रंग लगा,तू प्रीत जगा 
तेरे पाहुन की मिट्टी हूं..
माना प्रियतम इस व्योम तले
मुझ को तूझ संग, जीना होगा
इस मौन धरा के आंचल मे
जीवन अंकुर ,सीना होगा
तेरे पाहुन की मिट्टी हूं...
तेरे स्पंदन बन्घन से
मुझ को जाना है, मुझ तक
जब प्राण ओज का आवेदन
देता अनभिज्ञ, गौण सा मन
तब पूर्ण शमन कर खुलते है
उस न्यून धरा के, शून्य नयन !!
तेरे पाहुन की मिट्टी हूं....
मुझको जीवन का बोध करा !
- मुक्ता मिश्रा
यहाँ पाहुन अर्थात 
(अतिथि /कल्पना विचार जो बिना संदेस के आते है)  
और मिट्टी (उपकल्पना) है

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

वंदना.....कंचन अपराजिता

मन कोमल दो
विचार निर्मल दो
गीता के सार को
हे माँ! जीवन मे भर दो।

अपनी भक्ति दो
आत्मशक्ति दो
कर्तव्यनिष्ठा के राग को
जीवन का अंग कर दो

दया, ममता व करुणा
मुझ में रहे भरी
मेरी कलमों के स्याही को
अपने प्रेरणा से रंग दो

सरलता सादगी व स्नेह
मेरे हिय में बसें
अस्तित्व का एहसास देकर
एहसान मुझ पर कर दो

विद्या और विचार को
बुद्धि व संस्कार को
वाणी व व्यवहार को
मेरे यश के चादर की वितान
हे वीणावादिनी! तुम अनंत कर दो।

-कंचन अपराजिता, 
चेन्नई

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

तनहा-तनहा रहता हूँ.....महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

तनहा-तनहा रहता हूँ
दुनिया से मैं डरता हूँ

हर सू हैं काँटे बिखरे
डरता सा पग धरता हूँ

गलती कोई कब की है
लेकिन कारा सहता हूँ

निर्दोषी हूँ मैं बिल्कुल
सबसे कहता रहता हूँ 

मुंसिफ बिकते पैसों में
पर मैं लब सी रखता हूँ

जितना ही बचना चाहूँ
उतने कोड़े सहता हूँ

जाने क्या है बात ख़लिश
ज़ल्द न फिर भी मरता हूँ.
बहर --- २२२२  २२२
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

क्रमशः..........डॉ. प्रभा मुजुमदार

टूटे दर्पण से 
परावर्तित होकर 
अपनी ही अलग अलग आकृतियाँ 
धुँधलाती जा रही हैं । 
एक आवाज़ जो 
निर्जन खण्डहर की दीवारों से 
प्रतिध्वनित होकर 
बार बार गूँजती है 
खामोश होने से पहले।
समय के लम्बे अन्तराल में 
बहाव की दिशा बदलती हुई 
एक नदी 
सभ्यता के कितने ही 
तटों को 
पीछे छोड़ चुकी है 
वे जिंदा किले और 
गूँजते हुए महल 
खामोश खंडहरों में 
बदल चुके हैं... 
जिनके पीछे बहता हुआ 
छोटा सा एक झरना 
रेगिस्तान ने निगल लिया है।
-डॉ. प्रभा मुजुमदार


शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

सामने आ ज़रा.....पीताम्बरदास सराफ "रंक"

सामने आ ज़रा
ज़हन पे छा ज़रा॥१॥

झूमने दे मुझे
गीत तो गा ज़रा॥२॥

फूल सा मन खिला
हँस,खिलखिला ज़रा॥३॥

कांच में ज़िन्दगी
जाम टकरा ज़रा॥४॥

आज तो देख ले
नाच नंगा ज़रा॥५॥

छोड़ दी सभ्यता
दूर हट जा ज़रा॥६॥

धरम का ठीकरा
फोड़ तो,आ ज़रा॥७॥

आज पछतायगा
"रंक" थम जा ज़रा॥८॥

-पीताम्बर दास सराफ

14...बेताल पच्चीसी....चोर क्यों रोया

चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?” अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक सा...