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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

ढोल के अंदर पोल.....पूनम श्रीवास्तव

आज के जमाने की 
कितनी बड़ी विडम्बना
है ये कि
एक कुत्ते को खरीदने 
में पांच हजार रुपये खर्च कर 
सकता है 
इंसान और
उसे खिलाने में लगभग पांच
हजार खर्च कर
सकता है और अपनी
गाड़ी में बैठा कर 
घूमाता भी है
जिससे की उसका
स्टेटस बढ़ता है
पर एक गरीब के बच्चे
को दो वक़्त की रोटी
खिलाने में 
या पेट भरने में उसका 
पैसा तथा स्टेटस दोनों ही
कम हो जाते हैं।
है ना 
कितनी अजीब बात 
और ऊपर से
ये भी कहना की हमें इन गरीब
बच्चों के लिए 
कुछ तो करना चाहिए 
ढोल के अंदर पोल ।

-पूनम श्रीवास्तव

सोमवार, 20 नवंबर 2017

जमाना भी था तब दिल्लगी का...डॉ. इन्दिरा


सुना -अनसुना 
कर
हर पल गुजरता 
क्या किस्सा 
कहे उनकी 
बेरुखी का ! 
उमर का
सफीना 
साहिल पे डूबा 
जमाना भी था 
तब दिल्लगी का ! 
साँसो की 
बेचैनियाँ
क्या कहे हम 
लगता था 
चक्कर जो 
उनकी गली का !
मेरी
इस खता को 
ना हँस कर
उड़ाओ 
किस्सा है 
ये मेरी
बेबसी का !
चाहा
बता कर 
दिल हल्का 
कर ले 
मखौल का
सबब
बना ये 
गमी का ! 
डॉ. इन्दिरा 

रविवार, 19 नवंबर 2017

तुम नहीं होती तो........डॉ. विनीता राहुरिकर

तुम नहीं होती तो
अलसाया रहता है
खिड़की का पर्दा
सोया रहता है देर तक
सूरज से नजरें चुराता...,

तुम नहीं होती हो तो
उदास रहता है 
चाय का कप
अपने साथी की याद में....

साथ वाली कुर्सी भी
अपने खालीपन में
बैचेनी से
पहलू बदलती रहती है.....

रात में तकिया
बहुत याद करता है
तुम्हारी बेतरतीब
उनींदी बिखरी लटों
और निश्चिंत साँसों की
उष्मीय आत्मीयता को....

तुम नहीं होती तो
क्या कहूँ
मेरा हाल भी कुछ
पर्दे, कप, कुर्सी
और रात में 
तकिये जैसा ही होता है....

-डॉ. विनीता राहुरिकर

शनिवार, 18 नवंबर 2017

बुलबुले.....श्वेता सिन्हा


जीवन के निरंतर
प्रवाह में
इच्छाएँ हमारी
पानी के बुलबुले से
कम तो नहीं,
पनपती है
टिक कर कुछ पल
दूसरे क्षण फूट जाती है
कभी तैरती है
बहाव के सहारे
कुछ देर सतह पर,
एकदम हल्की नाजुक
हर बार मिलकर जल में
फिर से उग आती है
अपने मुताबिक,
सूरज के
तेज़ किरणों को
सहकर कभी दिखाती है
इंद्रधनुष से अनगित रंग
ख्वाहिशों का बुलबुला
जीवन सरिता के
प्रवाह का द्योतक है,
अंत में सिंधु में
विलीन हो जाने तक
बनते , बिगड़ते ,तैरते
अंतहीन बुलबुले
समय की धारा में
करते है संघर्षमय सफर।

  श्वेता🍁

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मायके में बिटिया रानी...नीतू ठाकुर


पलकों को आँचल से पोछा,
चेहरे पर मुस्कान सजाई,
जब देखी आंगन में मैंने,
अपने बाबुल की परछाई,
बार बार घड़ी को देखे,
जैसे समय को नाप रहे थे,
पल में अन्दर पल में बहार,
रस्ते को ही झाँक रहे थे,
देख मुझे सुध-बुध बिसराये,
घर के अन्दर ऐसे भागे,
जैसे उन बूढ़े पैरों में,
नये नवेले चक्के लागे,
भाग के आई मैया मेरी,
हाथों में एक थाल सजाये,
आँखों में ख़ुशी के आँसू,
दिल में कई अरमान बसाये,
चारों तरफ ख़ुशी का आलम,
कलियों पर मुस्कान सी छाई,
जैसे पूछ रहा था आंगन , 
बिटिया बरसों बाद तू आई,
कितना दे दें कितना कर दें,
दामन को खुशियों से भर दें,
मेरा सुख-दुःख बाँट रहे थे,
एक दूजे को डांट रहे थे,  
एक बूँद भी आ ना पाये,
उसकी आँखों से अब पानी,
बरसों बाद लौट कर आई,
है जब मेरी बिटिया रानी,
उनके मन में ऐसे बसी थी,
जैसे तन में प्राण समाये,
फिर क्यों वहाँ ना पाये इज्जत,
जिनकी खातिर उम्र बिताये ? 
- नीतू ठाकुर 

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ....अकबर इलाहाबादी

अकबर इलाहाबादी
16 नवम्बर 1846 - 15 फरवरी 1921

आज  श़ायर ज़नाब अकबर इलाहाबादी का जन्म दिन है
आज प्रस्तुत हैं उनकी दो रचनाएँ....

कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
कोई पा रहा है कोई खो रहा है

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत
कोई जागता है कोई सो रहा है

कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है

इसी सोच में मैं तो रहता हूँ 'अकबर'
यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है
....................
दूसरी रचना हास्यरस में है
पुरानी रोशनी में और नई में फ़र्क़ है इतना
उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता

दिल में अब नूरे-ख़ुदा के दिन गए
हड्डियों में फॉसफ़ोरस देखिए 

मेरी नसीहतों को सुन कर वो शोख़ बोला-
"नेटिव की क्या सनद है साहब कहे तो मानूँ"

नूरे इस्लाम ने समझा था मुनासिब पर्दा
शमा -ए -ख़ामोश को फ़ानूस की हाजत क्या है

बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया?’
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया.


हम आभारी हैँ..
 रचनाएँ व जानकारी कविता कोश से 

बुधवार, 15 नवंबर 2017

सितारे चूमते हैं शब....दिनेश नायडू

डरा रहे है ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे
दिखाई ख़ाब दिए रात भर खंडर के मुझे

मैं रोज़ ग़ज़लों में हर शाम चाँद टांकता हूँ
सितारे चूमते हैं शब ! उतर उतर के मुझे

गंवा दी उम्र तुझे नज़्म कर नहीं पाया
मिले हैं यूँ तो सलीक़े हरिक हुनर के मुझे

इस एक शौक ने मुझको मिटा दिया यारो !
बस एक बार कभी देखना था मर के मुझे

किनारे बैठ के करता हूँ नज़्म अश्कों को
नदी सुनाती है अफ़साने चश्मे-तर के मुझे

मैं इक अधूरी सी तस्वीर था उदासी की
किया है किसने मुकम्मल यूँ रंग भर के मुझे

09303985412

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...