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रविवार, 22 अक्टूबर 2017

हाँ, मैं तुम्हें महसूस कर सकती हूँ....श्वेता सिन्हा

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पल पल तुझमें खो जीकर
बूँद बूँद तुम्हें हृदय से पीकर
एहसास तुम्हारा अंजुरी में भर
अनकही तुम्हारी पीड़ा को छूकर
इन अदृश्य हवाओं में घुले
तुम्हारें श्वासों के मध्यम स्पंदन को
महसूस कर सकती हूँ।

निर्विकार , निर्निमेष कृत्रिम
आवरण में लिपटकर हंसते
कागज के पुष्प सदृश चमकीले
हिमशिला का कवच पहन
अन्तर्मन के ताप से पिघल
भीतर ही भीतर दरकते
पनीले आसमान सदृश बोझिल
तुम्हारी गीली मुस्कान को
महसूस कर सकती हूँ।

कर्म की तन्मयता में रत दिन रात
इच्छाओं के भँवर में उलझे मन
यंत्रचालित तन पे ओढ़कर कर
एक परत गाढ़ी तृप्ति का लबादा,
अपनों की सुख के साज पर
रुंधे गीतों के टूटते तार बाँधकर,
कर्णप्रिय रागों को सुनाकर
मिथ्या में झूमते उदासी को तुम्हारी
महसूस कर सकती हूँ।
हाँ, मैं तुम्हें महसूस कर सकती हूँ
       -श्वेता सिन्हा

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

बरसात में बरसेगी शराब...सुदर्शन फाक़िर

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कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया

हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया

दिल तो रोता रहे ओर आँख से आँसू न बहे
इश्क़ की ऐसी रिवायात ने दिल तोड़ दिया

वो मिरे हैं मुझे मिल जाएँगे आ जाएँगे
ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया

आप को प्यार है मुझ से कि नहीं है मुझ से
जाने क्यूँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया

- सुदर्शन फाक़िर

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....नीतू ठाकुर


ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....  

आज आँखों से बरसे जो आंसू तेरे,
दर्द दुनिया में सब को दिखाने लगे,
दर्द की इन्तेहाँ तुमने देखी कहाँ,
जो अभी से सभी को सुनाने लगे, 

 ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

तुम  जफायें करो हम वफायें करे,
जेब देता नहीं है सनम प्यार में,
उम्र भर राह हम तेरी तकते रहे,
जान लेलोगे तुम प्यार ही प्यार में,

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

हमने तुमको भुलाने की कोशिश जो की,
नींद अपनी सनम क्यों उड़ाने लगे,
भूल जाते हो अपनी खताओं को क्यों,
जो खतायें हमारी गिनाने लगे,

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

चैन लूटा मेरा, ख्वाब लुटे मेरे,
लूट कर हमसे नजरे चुराने लगे,
हमने नजरे हटाई जो तुमसे सनम,
बेवफाई की तोहमत लगाने लगे, 

ना हंसी के लिए ना ख़ुशी के लिए,
मै तो तरसी हूँ दो गज जमीं के लिए....

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

आनंद की आभा होती है .....अटलबिहारी वाजपेयी


जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई  में  भी  मेले  हों,
आनंद की आभा होती है 
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है 
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव  के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति  की  आभा होती  है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है .। 
-अटलबिहारी वाजपेयी

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

दीपावली। ...... खुशियों का त्यौहार ......" नीतू ठाकुर "




सुख शांति का वास रहे और वृद्धि हो खुशहाली में, जो चाहो वो सब मिल जाये अबके बरस दिवाली में, यदि मिट्टी के कुछ दीपक हम अबके बरस जलायेंगे, तो किसी गरीब की कुटिया में खुशियों के फूल खिलाएंगे, अथक परिश्रम करते है जो ठंडी,गर्मी,पानी में, कहीं ना टूटे उनके सपने हम सब की नादानी में, कितने सपने,कितनी आशा एक दीपक में बस जाती है, उम्मीद का सूरज उगता है जब भी दिवाली आती है, धन दौलत है पास तुम्हारे,उनकी झोली खली है, भूल ना जाना भाई मेरे उनके घर भी दिवाली है, पकवानों की चाह नहीं पर पूड़ी तो हो थाली में, अपना भी सहयोग हो शामिल उन सब की खुशहाली में, - नीतू ठाकुर

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

दीपावली.... श्वेता सिन्हा

इतराई निशा पहनकर 
झिलमिल दीपक हार
आया है जगमग जगमग
यह दीपों का त्योहार

रंगोली सतरंग सुवासित
बने गेंदा चमेली बंदनवार
किलके बालवृंद घर आँगन
महकी खुशियाँ अपरम्पार

मिट जाये तम जीवन से
लक्ष्मी माँ दे दो वरदान
हर लूँ निर्धनता हर घर से
हर होंठ खिले मुस्कान

भर भरकर मुट्ठी तारों से 
भरना है बाड़ी बस्ती में
दिन का सूरज भी न पहुँचे
निकले चाँद भी कश्ती में

इस दीवाली बन जाऊँ दीया
फैलूँ प्रकाश बन सपनों की
विहसे मुख मलिन जब किलके
मैं साक्षी बनूँ उन अपनों की

   #श्वेता

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!.........महादेवी वर्मा

1907-1987
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!

जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक
जलमय सागर का उर जलता;
विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम
वसुधा के जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल;
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!

मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर।
मैं अंचल की ओट किये हूँ!
अपनी मृदु पलकों से चंचल
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन
मैं दृग के अक्षय कोषों से-
तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

तुम असीम तेरा प्रकाश चिर
खेलेंगे नव खेल निरन्तर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा
अमिट चित्र अंकित करता चल,
सरल-सरल मेरे दीपक जल!

तू जल-जल जितना होता क्षय;
यह समीप आता छलनामय;
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
-महादेवी वर्मा

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...