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शनिवार, 9 सितंबर 2017

दिल की बात....अमित 'मौलिक' जैन


जो बचा बाँट लें, तल्ख़ रिश्ता करें 
अलहदा ठीक है, ख़त्म किस्सा करें।

ख़्वाब भर आहटें, रात भर करवटें 
इक पहर भर कसम, आओ हिस्सा करें।

इंतज़ामात कुछ, कुछ ख़ुरानी करो 
आओ दिल तोड़ लें, हाल ख़स्ता करें।

बांकपन मस्तियाँ, आशना छोड़ दो 
थोप कर तोहमतें, ग़ार चस्पा करें।

चांदनी बेअदब, नूर कातिल हुआ 
चाँद से दूरियां, रफ़्ता-रफ़्ता करें।

आसमाँ बन गये, तल्ख़ियों के धुंये
क्या मसीहा करें, क्या फ़रिश्ता करें।

सख्तियां नर्मियां, सारे टोने किये 
और क्या बेशरम, दिल का नुस्ख़ा करें।

13 टिप्‍पणियां:

  1. टूट-फूट जद्दोजहद से आगे बढ़ती हुई गजल यथार्थपरक हो गई है। बेहतरीन अभिव्यक्ति। बधाई।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-09-2017) को "चमन का सिंगार करना चाहिए" (चर्चा अंक 2723) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत खूब ! हर एक शेर दिल में उतरता हुआ ।

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  4. वाह ! बेहतरीन ग़ज़ल ! हर शेर लाजवाब ! बहुत खूब

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  5. अमितजी, बस लाजबाब! लिखते रहिये।

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  6. वाह ... बहुत ही खूबसूरत शेर ग़ज़ल के ...

    उत्तर देंहटाएं

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