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बुधवार, 13 सितंबर 2017

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों....इब्ने इंशा

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ

जी मचलता था हर इक शय पे मगर
जेब ख़ाली थी, कुछ मोल न ले सका

लौट आया, लिए हसरते सैंकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

खैर मेहरूमियों के वो दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से

जी में आता है इक इक दुकान मोल लूँ
जो मैं चाहूँ तो सारा जहां मोल लूं

नारसाई का अब में धड़का कहां
पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहां ?
-इब्ने इंशा

6 टिप्‍पणियां:

  1. मशहूर पाकिस्तानी शायर इब्ने इंसा ( जिन्हें हम उनकी एक ग़ज़ल "कल चौदहवीं की रात थी ,सब भर रहा चर्चा तेरा " से ज़्यादा जानते हैं ) की मर्मस्पर्शी रचना साझा करने के लिए बहुत-बहुत आभार।

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  2. इब्ने इंशा
    हर किस्म की
    कविता
    ग़ज़ल
    नज़्मों
    की खदान
    ...आदर सहित

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-09-2017) को
    "शब्द से ख़ामोशी तक" (चर्चा अंक 2728)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हिन्दी दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं

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