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मंगलवार, 12 सितंबर 2017

भरा शहर वीराना है.....श्वेता सिन्हा

पहचाने चेहरे हैं सारे
क्यूँ लगता अंजाना है।
उग आये हैं कंक्रीट वन
भरा शहर वीराना है।

बहे लहू जिस्मों पे ख़ंजर
न दिखलाओ ऐसा मंज़र,
चौराहे पर खड़े शिकारी
लेकर हाथ में दाना है।

चेहरों पर चेहरे हैं बाँधें
लोमड़ और गीदड़ हैं सारे,
नहीं सलामत एक भी शीशा
पत्थर से  याराना है।

मरी हया और सूखा पानी
लूट नोच करते मनमानी,
गूँगी लाशें जली ज़मीर का
हिसाब यहीं दे जाना है।

वक़्त सिकंदर सबका बैठा
जो चाहे जितना भी ऐंठा,
पिघल पिघल कर जिस्मों को
माटी ही हो जाना है।

-श्वेता सिन्हा

14 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ संध्या श्वेता सखी
    आभार इस बेहतरीन कविता के लिए
    सादर

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  2. शुभ संध्या दी,
    बहुत सारा सारा आभार आपका दी:)
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय श्वेता जी बहुत खूब रचना | एक एक शेर सार्थक और लाजवाब है | सस्नेह शुभकामना ------

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  4. शुभ संध्या।
    परिवेश की चीत्कार को महसूस कराती एक मंचीय रचना। अच्छा हो कि रचना का संदेश लक्ष्य तक पहुँचे। नफ़रत और अतिवाद का माहौल दहशत में जीने को विवश करता है। संसार की असारता और वक़्त के निज़ाम को अंतिम बंद में बड़ी ख़ूबसूरती मिली है। बधाई एवं शुभकामनाऐं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह.....
    आज के परिवेश को उजागर करती रचना

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  6. निशा स्वस्ति..
    बहुत सुंदर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  7. चेहरों पर चेहरे है बाँधें
    लोमड़ और गीदड़ है सारे,
    नहीं सलामत एक भी शीशा
    पत्थर से याराना है।
    यही हाल है चारों ओर ! बखूबी लिखा आपने श्वेता जी।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जीवन की सच्चाई है जो लिखी है आपने ... जिसमं के साथ सभी कुछ यहाँ रह जाना है ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. वक़्त सिकंदर सबका बैठा
    जो चाहे जितना भी ऐंठा,
    पिघल पिघल कर जिस्मों को
    माटी ही हो जाना है।

    तुच्छता को आगाह करती शानदार रचना। स्वार्थपरता का खाका खीँचती शानदार रचना श्वेता जी।

    उत्तर देंहटाएं
  10. Bahut dilkash abhivyakti hai apki.
    na keval isi rachna ki balki ab tak jitna maine padha hai sabhi ke liye.
    Eshwar apki lekhni ko anvaratta pradan kare.

    उत्तर देंहटाएं

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