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रविवार, 12 नवंबर 2017

सुबह का चलकर.......श्वेता सिन्हा

सुबह का चलकर शाम में ढलना।
जीवन का हर दिन जिस्म बदलना।।

हसरतों की रेत पे दरिया उम्मीद की,
खुशी की चाह है मिराज़ सा छलना।

चुभते हो काँटें ही काँटों का क्या है
जारी है गुल पर तितली का मचलना

वक्त के हाथों से ज़िदगी फिसलती है,
नामुमकिन इकपल भी उम्र का टलना।

अंधेरे नहीं होते हमसफर ज़िदगी में,
सफर के लिये तय सूरज का निकलना।

      #श्वेता🍁

9 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ संध्या
    बेहतरीन...
    खुश हो गए हम
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर अभिव्यक्ति
    बधाई और शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  3. उम्दा गनुक....
    आभार पढ़वाने के लिए....
    सादर.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (14-11-2017) को
    "कभी अच्छी बकवास भी कीजिए" (चर्चा अंक 2788)
    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

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