24 नवम्बर 1952 - 26 दिसम्बर 1994
चेहरा मेरा था निगाहें उसकी
खामोशी में भी वो बातें उसकी
मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गई
शेर कहती हुई आँखें उसकी
शोख लम्हों का पता देने लगी
तेज़ होती हुई साँसें उसकी
ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी
ध्यान में उसके ये आलम था कभी
आँख महताब की यादें उसकी
-परवीन शाकिर

बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंआभार अग्रज
हटाएंसादर
बहुत ही लाज़वाब👌👌
जवाब देंहटाएंवाह ! ,बेजोड़ पंक्तियाँ ,सुन्दर अभिव्यक्ति आभार "एकलव्य"
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जवाब देंहटाएंशानदार ग़ज़ल। सरलता की शक्ति का एहसास देती ख़ूबसूरत प्रस्तुति।
बहुत खूब ..
जवाब देंहटाएंकमाल की ग़ज़ल प्रस्तुति का आभार ...
जवाब देंहटाएंयह ग़ज़ल सच में उस एहसास को पकड़ लेती है जब दो लोग बिना बोले भी सब कह देते हैं। तुमने जिस तरह नज़रों, साँसों और खामोशी को बयान किया है, वो बहुत असली लगता है। प्यार अक्सर शब्दों में नहीं, उन छोटे पलों में चमकता है, और यहाँ वही चमक दिख रही है।
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