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रविवार, 3 सितंबर 2017

तेज़ होती हुई साँसें...परवीन शाकिर

24 नवम्बर 1952 - 26 दिसम्बर 1994
चेहरा मेरा था निगाहें उसकी 
खामोशी में भी वो बातें उसकी

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गई
शेर कहती हुई आँखें उसकी 

शोख लम्हों का पता देने लगी 
तेज़ होती हुई साँसें उसकी 

ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने 
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी 

ध्यान में उसके ये आलम था कभी 
आँख महताब की यादें उसकी

-परवीन शाकिर

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-09-2017) को "आदमी की औकात" (चर्चा अंक 2717) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह ! ,बेजोड़ पंक्तियाँ ,सुन्दर अभिव्यक्ति आभार "एकलव्य"

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  3. शानदार ग़ज़ल। सरलता की शक्ति का एहसास देती ख़ूबसूरत प्रस्तुति।

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  4. कमाल की ग़ज़ल प्रस्तुति का आभार ...

    जवाब देंहटाएं

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