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गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

पिता.....नादिर खान


वो छुपाते रहे अपना दर्द
अपनी परेशानियाँ
यहाँ तक कि
अपनी बीमारी भी….

वो सोखते रहे परिवार का दर्द
कभी रिसने नहीं दिया
वो सुनते रहे हमारी शिकायतें
अपनी सफाई दिये बिना ….

वो समेटते रहे
बिखरे हुये पन्ने
हम सबकी ज़िंदगी के …..

हम सब बढ़ते रहे
उनका एहसान माने बिना
उन पर एहसान जताते हुये
वो चुपचाप जीते रहे
क्योंकि वो पेड़ थे
फलदार
छायादार ।
- नादिर खान
किताबें बोलती हैं


6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (29-12-2017) को "गालिब के नाम" (चर्चा अंक-2832) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    क्रिसमस हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. हम सब बढ़ते रहे
    उनका एहसान माने बिना
    उन पर एहसान जताते हुये
    वो चुपचाप जीते रहे
    क्योंकि वो पेड़ थे
    फलदार
    छायादार ।
    बहुत बढ़िया।

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह बहुत खूब ..
    .पिता एक वट वृक्ष सा
    आते जाते सुख ही देय
    चाहे सीचौ नीर जल
    चाहे काटो वाको पेट ! !

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  4. पापा.... सच में बिन इनके हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते मेरे लिए तो माँ पापा आप ही हो

    जवाब देंहटाएं

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