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सोमवार, 1 अप्रैल 2019

ज़िंदगी के रूप.... नरेन्द्र श्रीवास्तव


कहीं  तेज़  तर्रार  ज़िंदगी।
कहीं फूल का हार ज़िंदगी॥

कहीं बर्फ़ -सी ठंडक रखे।
कहीं सुर्ख़ अंगार  ज़िंदगी॥

कहीं माथे की बिंदिया जैसी।
कहीं पायल-झंकार ज़िंदगी॥

कहीं ज्येष्ठ की दुपहरी-सी।
कहीं सावन फुहार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी अँसुअन भींजी।
कहीं लगे ख़ुशगवार ज़िंदगी॥

कहीं पेड़ खजूर-सी लगती।
कहीं कदम की डाल ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी बरस सरीखी।
कही लगे दिन चार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी सीधी-सादी।
कहीं लगे श्रृंगार ज़िंदगी।।

कहीं अमावस-सी अँधियारी।
कहीं पूनम उजियार ज़िंदगी।।

कहीं ज़िंदगी भाषण जैसी।
कहीं लगे उद् गार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी खाली डब्बा।
कहीं भरे भंडार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी काली ज़ुल्मी।
कहीं धवल चमकार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी शुष्क, कसैली।
कहीं लगे रसधार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी भिक्षुक जैसी।
कहीं सेठ कलदार ज़िंदगी॥

कहीं ज़िंदगी सूट सफ़ारी।
कहीं लगे फटेहाल ज़िंदगी॥

कहीं  ज़िंदगी  भाग  रही है।
कहीं मद्धिम रफ़्तार ज़िंदगी॥

जाने कितने रूप लिये ये।
अद्भुत है उपहार ज़िंदगी॥

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

“ज़माने में यही होता रहा है”.....अखिल भंडारी


किनारे पर खड़ा क्या सोचता है 
समुंदर दूर तक फैला हुआ है 

ज़मीं पैरों से निकली जा रही है 
सितारों की तरफ़ क्या देखता है 

चलो अब ढूँढ लें हम कारवाँ इक 
बड़ी मुश्किल से ये रस्ता मिला है 

हमें तो खींच लाई है मुहब्बत
तुम्हारा शहर तो देखा हुआ है 

नये कपड़े पहन के जा रहे हो 
वहाँ कीचड़ उछाला जा रहा है 

वहाँ तो बारिशें ही बारिशें हैं 
यहाँ कोई बदन जलता रहा है 

कभी उस को भी थी मुझ से मुहब्बत 
ये क़िस्सा अब पुराना हो चुका है 

बुरे दिन हैं सभी मुँह मोड़ लेंगे 
“ज़माने में यही होता रहा है”
-अखिल भंडारी

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

पहाड़ी नदी के बारे में,,,,,सुशील कुमार


अपनी बाँहों में
कलसियाँ
होठों पर
वीरानियों से सनी
घिर आयी साँझ की
कोई विदागीत
गुनगुनाती पहाड़न
उस बूढ़ी नदी के
सीने पर
छोटी-छोटी
कटोरियाँ
बनाती है
रेत से
रेत को
अलग करके ।

क्षण में उस वृद्धा के
विलाप से
कटोरियों का तल
पसीज जाता है
और अँजुरी समाने भर
पारभासी नीर
पात्र में
थिराने लगता है
पहाड़न
उलीच-उलीच कर उसे
वियोगिनी नदी माता के
आँचल में
डाल देती है
यज्ञ के अनल-कुंड में
पूजित भाव से प्रक्षेपित
हव्य की तरह।
तब स्नेहिल
वात्सल्य का
स्वच्छ
पारदर्शी
प्रशांत जल
पात्र में
ठहरने लगता है और
पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर होने लगता है ।
पहाड़ की मिट्टी से बनी
कलसियों में
पहाड़ का दुःख
नदी का ममत्व भरकर

वरह की कोई पहाड़ी गीत
फिर गुनगुनाती,
अंधेरे होते
अपने गेहों को
लौटती पहाड़न के
पदचाप
और स्वर
तब सिर्फ़
नदी और पहाड़ ही
सुन पाते हैं
उस सुनसान दयार में।

-सुशील कुमार

सोमवार, 29 जनवरी 2018

अचेतन......मीना चोपड़ा


Image result for जला करते हैं
जला करते हैं
राख से निकलकर अँधेरे
साँस के टुकड़े को
जगाने के लिये,
उम्र की नापाक
हथेली से फिसलकर
जो बियाबान जंगलों में घिरी
संकीर्ण गुफाओं में छुपा
नींद को ओढ़े हुए
सोने का बहाना करता है।

-मीना चोपड़ा
 नैनीताल 

रविवार, 28 जनवरी 2018

वो शिकार देखिये.....उपेन्द्र परवाज़

उनकी निगाहों के वार देखिये
जो बच गए घायल, वो शिकार देखिये।

मेरे दिल की कोई अब कीमत कहाँ रही 
उनके दिल के, आज खरीददार देखिये।

बारिशों में खुलने लगे है अब हुस्न के भरम 
जो रंग छोड़ने लगे, वो रुख़सार देखिये।

गुज़रे जहाँ से वहाँ हुए, क्या क्या नहीं सितम
तीमारदार भी हो गये, अब बीमार देखिये।

फ़िज़ा में हुस्न का ज़हर फैला है इस कदर 
कि उतर नहीं रहे अब, इश्क के बुखार देखिये।

जब दिल की तमन्नाओ पे फिर ही गया पानी 
तो “परवाज़” मोहब्बतों के कारोबार देखिये।
-उपेन्द्र परवाज़

शनिवार, 27 जनवरी 2018

अदेह....शैलेन्द्र चौहान

आँखों में
धुँआ
जैसे अन्धा कुआँ

सूरदास की आँखें
बगुला की पाँखें

तुमने मुझे छुआ
अंधेरे में
अदेह !

मैं उड़ा
झपटा मछली की
आँख पर

सूखे पोखर का
रहस्य
न मछली
न मछली की आँख

बस
सूखे कठोर
मिट्टी के ढेले

-शैलेन्द्र चौहान

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

नफ़े का है सौदा इसे मत गँवाना....देवी नागरानी

बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना।

ये कलियाँ, ये गुंचे ये रंग और ख़ुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना।

हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना।

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना।

खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गँवाना।

मैं देवी ख़ुदा से दुआ माँगती हूँ
बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना।
-देवी नागरानी

सोमवार, 22 जनवरी 2018

दुनियाँ पर भारी हो गया.....सजीवन मयंक

ईमानदारी से चला दुनियाँ पर भारी हो गया।
कुछ दिनों के बाद सड़कों पर भिखारी हो गया।।

सामने कुछ और कहते पीठ पीछे और कुछ।
इस कला का नाम अब तो दुनियादारी हो गया।।

दुनियाँभर के जुर्म जो ता उम्र भर करता रहा।
आज कल वो किसी मंदिर का पुजारी हो गया।।

लोग अब एहसान भी करते किसी पर इस तरह।
ज़िंदगी भर के लिये कर्ज़ा उधारी हो गया।।

ताल की इन मछलियों को क्यों नहीं विश्वास है।
आज का बगुला भगत भी शाकाहारी हो गया।।
-सजीवन मयंक

रविवार, 21 जनवरी 2018

यूँ जब-जब शबनम रोती है...’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी

२२ २२ २२ २२
यूँ जब-जब शबनम रोती है
यह देख के शब नम होती है

दुनिया परवाह करेगी क्यों
ज़ख़्मों पर वाह जो होती है

जगमग देखी दुनिया मेरी
जग मग में ख़्वाब डुबोती है

प्रिय तम में छोड़ गया उसको
प्रियतम की ख़ातिर रोती है

मूसा फिर राह दिखाते जब
फिर राहे-मुसाफ़िर होती है
-’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

12 क्षणिकाएँ.....डॉ. सुधा गुप्ता


क्षणिकाएँ
............................
गुलाब की नन्हीं कली
तोड़, तुम्हारे बालों में 
सजा दी 
उँगली में चुभा काँटा 
रहा याद दिलाता
कि तुम चली गई …
.......
कैक्टस कठोर
काँटों से भरा, बदसूरत 
निकली कली 
कोमल / अपूर्व सुन्दरी॥
दन्तैल भयावह राक्षस की
सपना बिटिया।
......
मुद्दत बाद 
तुम्हारे शहर आना हुआ 
धड़कते दिल से
मौहल्ला, गली, मकान
खोज डाला / सब कुछ 
वही था।
जस का तस 
सिर्फ़ तुम थे गुम
......
पावस-साँझ ।
आकाश में 
इन्द्र धनु उग आया
मन भरमाया
ख़यालों में लहराया
तेरा / बहुरंगी आँचल ।
......
सीप के अधर खुले 
कोई / स्वाति- बूँद
आ गिरे 
मोती बन… उगे ।
.......
अभी भोर थी 
दस्तक पड़ी 
खोला जो द्वार
हर्ष का न रहा
पारावार,
वसन्त खड़ा था ।
.....
नहा-धोकर
ऊषा ने खोले
पावन द्वार
निराले पंछी
मधुर स्वरों में 
गाते गुरबानी ।
.......
तुम्हें विदा दे 
ज्यों ही मुड़ी, देहरी के पार 
एक साथ यादें करने लगीं
कदम ताल-------
......
आज के नाते-रिश्ते
बोझ –केवल बोझ
गरमाई
बरसों पुरानी भरी 
ठण्डी बोसीदा रज़ाई ।
.......
हज़ारों
नन्हें-नन्हें पुरज़े
लिख मारे 
प्रेम -मतवारे वसन्त ने
धरती के नाम
अब /इधर –उधर 
हवा में 
उड़ते फिर रहे हैं।
.......
सपनों ने लुभाया
तो चट्टानों से टकराया
आशा ने बुलाया-
बियाबान में ला पटका
मासूम बेचारा दिल ।
......
धूल से अँटा 
मैला- सा एक दिन
खुल पड़ा / अनायास
मन का भण्डार 
वहाँ भी भरा था 
यादों का गर्द-गुबार ।
-डॉ. सुधा गुप्ता

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

भूखे पेट भजन होता है....रामश्याम हसीन

भूखे पेट भजन होता है
अपना अपना मन होता है 

होता कुछ है कुछ दिखलाता 
ऐसा भी दर्पण होता है 

पैसे वाले में दिल मुश्किल 
दिल बाला निर्धन होता है 

सुलझे-सुलझे जीवन में भी 
उलझा-उलझा मन होता है 

हर पारीना घर में अब भी 
सबका इक आँगन होता है
-रामश्याम हसीन

रविवार, 17 दिसंबर 2017

अनाथ पत्ता......डॉ. आरती स्मित


मैं हूँ 
शाख- विहीन 
एक अनाथ पत्ता!
बेबुनियाद --–अस्तित्वहीन।
कल तक,
मैं था 
निश्चिंत, प्रमुदित 
पेड़ की शाख से जुड़ा 
जीवन–रस पाता हुआ;
कल तक,
समझ ना सका महत्व
जड़ से जुड़ाव का;
वंश के पोषण का, 
विद्रोह की आँधी चली 
और मैं,
दिशाहीन!
प्रतिकूल दशा में 
क्षत-विक्षत पड़ा हूँ 
भूमि पर 
और कोई 
देखता तक नहीं।



- डॉ. आरती स्मित

रविवार, 26 नवंबर 2017

मुझे ऐसे रुलाया न करो..........कुसुम सिन्हा


ऐसे तुम मुझको बेरुख़ी से सताया न करो
बेवफ़ा कहके मुझे ऐसे रुलाया न करो

जब से बिछडे हो अश्क़ गिराती हैं मेरी आँखें
बर्बाद करके मुझको मुस्कुराया न करो

काँटों भरी हैं राहें और गहरी तन्हाई है
हँस हँस के मेरे को और बढ़या न करो

ज़िन्दगी की राह में कुछ और भी ग़म हैं
इक ख़ुशी थी प्यार की उसको घटाया न करो

नाम लिख कर मेरा किसी ख़त में अपने
बेदर्दी से तुम उसको मिटाया न करो
-कुसुम सिन्हा

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...