
लिखी जाती है कविता...
किसी कवि की कलम से...
उतरती है सियाही कागज पर..
पूरी होती जब वो कविता...
पढ़ता है कवि उसे और
उस बदनसीब कागज को
फेंक देता है..
बनाकर लड्डू जैसा गोल,,,,
सोचता है कुछ
फिर उठाकर उस
लड्डू को...
खोलकर एतिहात से...
पढ़ता है
पुनः और पुनः ....
उतारता है उस कविता को...
कागज एक नया लेकर..
फिर लिखता है कुछ...
चेहरे पर उसके
मुस्कान एक
छोटी सी आती है....
सहेज लेता है उसे..
सोचता है...
तसल्ली है उसे..
पूरी हो गई ये कविता..
नहीं है परवाह उसे...
कि क्या सोचेगा..
पढ़ने वाला उस
कविता को...उसे
इस बात की...
कतई नहीं है चिन्ता
क्योंकि जानता है वह
कि यह कविता उसने
लिखी ही है...
अपने आप के लिए..
-यशोदा