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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

प्रलय.......डॉ. जेन्नी शबनम


नहीं मालूम कौन ले गया 
रोटी को और सपनों को 
सिरहाने की नींद को 
और तन के ठौर को 
राह दिखाते ध्रुव तारे को 
और दिन के उजाले को 
मन की छाँव को 
और अपनों के गाँव को 
धधकती धरती और दहकता सूरज 
बौखलाई नदी और चीखता मौसम 
बाट जोह रहा है 
मेरे पिघलने का 
मेरे बिखरने का 
मैं ढहूँ तो एक बात हो 
मैं मिटूँ तो कोई बात हो!

-डॉ. जेन्नी शबनम

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

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