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बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

सारे मौसम बदल गए शायद - अलीना इतरत

सारे मौसम बदल गए शायद 
और हम भी सँभल गए शायद 

झील को कर के माहताब सुपुर्द
अक्स पा कर बहल गए शायद

एक ठहराव आ गया कैसा 
ज़ाविए ही बदल गए शायद

अपनी लौ में तपा के हम ख़ुद को 
मोम बन कर पिघल गए शायद

काँपती लौ क़रार पाने लगी 
झोंके आ कर निकल गए शायद 

हम हवा से बचा रहे थे जिन्हें 
उन चराग़ों से जल गए शायद 

अब के बरसात में भी दिल ख़ुश है 
हिज्र के ख़ौफ़ टल गए शायद 

साफ़ होने लगे सभी मंज़र 
अश्क आँखों से ढल गए शायद 

बारिश-ए-संग जैसे बारिश-ए-गुल 
सारे पत्थर पिघल गए शायद

वो 'अलीना' बदल गया था बहुत 
इस लिए हम सँभल गए शायद 


  

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

क़लन्दर तो ज़मीं पर बैठते हैं.....राज़िक़ अंसारी

चलो चल कर वहीं पर बैठते हैं
जहां पर सब बराबर बैठते हैं

न जाने क्यों घुटन सी हो रही है
बदन से चल के बाहर बैठते हैं

हमारी हार का ऐलान होगा
अगर हम लोग थक कर बैठते हैं

तुम्हारे साथ में गुज़रे हुए पल
हमारे साथ शब भर बैठते हैं

बताओ किस लिये हैं नर्म सोफ़े 
क़लन्दर तो ज़मीं पर बैठते हैं

तुम्हारी बे हिसी बतला रही है
हमारे साथ पत्थर बैठते हैं 

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

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