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सोमवार, 27 नवंबर 2017

मेरे ही सर को छूकर बोलते हैं...राजेश रेड्डी

ज़ुबां ख़ामोश है डर बोलते हैं
अब इस बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं

मेरी परवाज़ की सारी कहानी
मेरे टूटे हुए पर बोलते हैं

सराये है जिसे नादां मुसाफि़र
कभी दुनिया कभी घर बोलते हैं

तेरे हमराह मंज़िल तक चलेंगे
मेरी राहों के पत्थर बोलते हैं

नया इक हादिसा होने को है फिर
कुछ ऐसा ही ये मंज़र बोलते हैं

मेरे ये दोस्त मुझसे झूठ भी अब
मेरे ही सर को छूकर बोलते हैं
- राजेश रेड्डी

बुधवार, 6 सितंबर 2017

ये चादर है मैली- पुरानी, बदल दे....राजेश रेड्डी

मेरी ज़िंदगी के मआनी बदल दे
खु़दा इस समुन्दर का पानी बदल दे

कई बाक़ये यूँ लगे, जैसे कोई
सुनाते-सुनाते कहानी बदल दे

न आया तमाम उम्र आखि़र न आया
वो पल जो मेरी ज़िंदगानी बदल दे

उढ़ा दे मेरी रूह को इक नया तन
ये चादर है मैली- पुरानी, बदल दे

है सदियों से दुनिया में दुख़ की हकूमत
खु़दा! अब तो ये हुक्मरानी बदल दे

-राजेश रेड्डी

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

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