घर में बैठे रहें तो भीगें कब।
बारिशों से बचें तो भीगें कब॥
पत्थरों का मिज़ाज रख के हम।
यूँ ही ऐंठे रहें तो भीगें कब॥
आँसुओं का लिबास आँखों पर।
ये भी सूखी रहें तो भीगें कब॥
जिस्म कपडें का जान पत्तों की।
हम भी काग़ज़ बनें तो भीगें कब॥
उनके बालों से गिर रही बूँदें।
हम ये शबनम पियें तो भीगें कब॥
तेरे हाथों में हाथ साहिल पर।
अब न आगे बढ़ें तो भीगें कब॥
दूर तक बादलों का गीलापन।
और हम घर चलें तो भीगें कब॥
-रामबाबू रस्तोगी
